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नागपुर हाईकोर्ट का अहम फैसला: 8 साल की बच्ची की कस्टडी याचिका खारिज, बच्चे का हित सर्वोपरि

Nagpur Child Welfare Principle: नागपुर हाई कोर्ट ने बच्ची की कस्टडी मामले में पिता की याचिका खारिज की। अदालत ने कहा, बच्ची का हित सर्वोपरि है, इसे अवैध हिरासत नहीं माना जा सकता।

  • Written By: अंकिता पटेल
Updated On: May 04, 2026 | 09:52 AM

नागपुर हाई कोर्ट,(सोर्स: सोशल मीडिया)

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Nagpur High Court: नागपुर हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में 8 साल की बच्ची की कस्टडी मांगने वाले पिता की बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कार्पस) याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्ची जन्म से ही अपने ननिहाल में है, इसलिए इसे अवैध हिरासत नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि बच्ची का कल्याण सर्वोपरि है और कस्टडी के मामलों को केवल संपत्ति की तरह हस्तांतरित नहीं किया जा सकता। याचिकाकर्ता सुनील परतेती का विवाह 4 मई 2017 को सुवर्णा सरेयाम के साथ हुआ था।

6 अप्रैल 2018 को उनकी एक बेटी का जन्म हुआ। वैवाहिक विवादों के कारण सुवर्णा अपनी बच्ची के साथ छिंदवाड़ा (मध्य प्रदेश) स्थित अपने मायके में रहने लगी थीं जहां 19 जून 2020 को उनका निधन हो गया।

इसके बाद सुनील ने 26 दिसंबर 2021 को दूसरी शादी कर ली। अवैध हिरासत नहीं, बच्ची का कल्याण है सर्वोपरि हाई कोर्ट ने फैसले में कहा कि ‘बंदी प्रत्यक्षीकरण’ रिट केवल तभी लागू होती है जब बच्चे की हिरासत अवैध हो या बिना किसी कानूनी अधिकार के हो।

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बच्ची जन्म के बाद से ही अपनी मां और मां की मृत्यु के बाद से अपने नाना-नानी (अंकुश और लीलाचाई) और मामा-मौसी के पास रह रही है। अदालत ने कहा कि बच्ची ने जन्म से ही अपने पिता को नहीं देखा है। ऐसे में अचानक उसकी कस्टडी पिता को सौंपने से बच्ची मानसिक रूप से परेशान हो सकती है।

पिता को मिलने का अधिकार

हाई कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि पिता के पास कस्टडी हासिल करने के लिए फैमिली कोर्ट (गार्जियंस एंड वार्ड्स एक्ट) में जाने का कानूनी विकल्प मौजूद है। हालांकि बच्ची के सर्वोत्तम हितों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने मिता को अपनी बेटी से मिलने की अनुमति दी है।

अदालत के आदेशानुसार पिता अब हर 15 दिन में एक बार (कार्यकारी शनिवार को) सुबह 11 से दोपहर 2 बजे के बीच सौसर (छिंदवाड़ा) के तालुका विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव के कार्यालय में अपनी बेटी से मिल सकेंगे।

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भरण-पोषण आदेश के बाद पिता ने मांगा अधिकार

अदालत ने सुनवाई के दौरान पिता के आचरण पर गौर किया, कोर्ट ने पाया कि पत्नी की मृत्यु के बाद 3 साल तक पिता ने बच्ची की कस्टडी पाने के लिए कोई कानूनी प्रयास या आवेदन नहीं किया, जब बच्ची के मामा (प्रतिवादी) ने 2020 में भरण-पोषण का मामला दर्ज कराया और जनवरी 2022 में थिता के खिलाफ अंतरिम भरण-पोषण देने का आदेश पारित हुआ तब उसके बाद पिता ने 2023 में यह याचिका दायर की।

Nagpur high court child custody habeas corpus dismissed welfare priority

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Published On: May 04, 2026 | 09:52 AM

Topics:  

  • Child Care
  • High Court
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