Kinkhede Layout: हाई कोर्ट ने सिविल रिवीजन में 77 दिन की देरी माफ की, शुल्क जमा करने के बाद होगी सुनवाई

Nagpur Court Order: नागपुर हाई कोर्ट ने किंखेडे लेआउट प्लॉट होल्डर्स एसोसिएशन से जुड़े मामले में सिविल रिवीजन आवेदन दाखिल करने में हुई 77 दिनों की देरी माफ कर दी।
nagpur high court 77 days delay condoned kinkhede layout case
हाई कोर्ट नागपुर खंडपीठ(सोर्सः सोशल मीडिया)
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Kinkhede Layout Plot Holders Association: लेआउट प्लॉट ओनर्स एसोसिएशन से जुड़े एक मामले में लंबी सुनवाई के बाद न्यायाधीश वाई.जी. खोबरागडे ने सिविल रिवीजन आवेदन दाखिल करने में हुई 77 दिनों की देरी माफ कर दी।

हालांकि अदालत ने देरी के कारण दूसरे पक्ष को हुई परेशानी को ध्यान में रखते हुए याचिकाकर्ता पर 5 हजार रुपए का शुल्क लगाया। यह राशि एक सप्ताह के भीतर किंखेडे लेआउट प्लॉट होल्डर्स एसोसिएशन को अदा करने के आदेश भी दिए। याचिकाकर्ता विवेक रघुनाथ खांजोडे की ओर से दिवानी अर्जी दायर की गई।

अमेरिकी नागरिक होने के कारण बढ़ी प्रक्रिया

आवेदन के अनुसार याचिकाकर्ता अमेरिका के नागरिक हैं। उन्होंने अपने पिता रघुनाथ खांजोडे जो स्वयं भी अमेरिका के नागरिक हैं, के नाम पावर ऑफ अटॉर्नी निष्पादित की थी। इस दस्तावेज के निष्पादन के बाद क उसे दूतावास से मंजूरी दिलाने तथा नागपुर में उनके अधिवक्ता तक भेजने की प्रक्रिया में समय लगा। इसी वजह से सिविल रिवीजन आवेदन दाखिल करने में 77 दिनों की देरी हुई।

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देरी का कारण बता

नागपुर के स्मॉल कॉज कोर्ट निचली अदालत के आदेश को दी गई के द्वितीय अतिरिक्त न्यायाधीश द्वारा 25 मार्च 2026 को पारित आदेश को चुनौती देते हुए आवेदन दाखिल किया गया है। देरी माफी के लिए प्रस्तुत आवेदन में इसी आदेश के खिलाफ रिवीजन दाखिल करने में हुई देरी का कारण बताया गया था।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता चिन्मय धर्माधिकारी, एसोसिएशन की ओर से अधि. ए.जी. शितूत ने पैरवी की। एसोसिएशन की ओर से देरी माफ करने का कड़ा विरोध किया गया, जबकि दूसरे गैर-याचिकाकर्ता की ओर से उचित आदेश पारित करने का अनुरोध किया गया।

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शुल्क जमा करने के बाद हौंगी रिवीजन पर सुनवाई

हाई कोर्ट ने आवेदन में बताए गए कारणों और याचिकाकर्ता की शिकायत पर विचार करते हुए 77 दिनों की देरी को माफ करना न्यायोचित माना। हालांकि, देरी के कारण गैर-याचिकाकर्ता क्रमांक-1 को परेशानी उठानी पड़ी, इसलिए 5 हजार रुपए लागत लगाने की शर्त रखी गई है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि शुल्क का भुगतान करने के बाद मामले को सुनवाई के लिए पेश किया जाए।

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