डेंटल सुपर स्पेशलिटी अस्पताल (सौजन्य-नवभारत)
Government Dental College Hospital: अत्याधुनिक दंत उपचार सरकारी स्तर पर उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शासकीय दंत महाविद्यालय में डेंटल सुपर स्पेशलिटी अस्पताल स्थापित करने का महत्वाकांक्षी निर्णय लिया गया लेकिन प्रशासनिक उदासीनता और निधि के अभाव के कारण यह प्रकल्प 7 वर्ष बाद भी शुरू नहीं हो सका है। उपकरणों सहित अन्य सामग्री के लिए करीब 11 करोड़ रुपये चाहिए लेकिन सरकार इस निधि के लिए वर्ष भर से तरसा रही है।
13 अप्रैल 2018 को इस अस्पताल को प्रशासनिक मंजूरी मिली थी। 4 जनवरी 2019 को शासकीय दंत महाविद्यालय के स्वर्ण जयंती समारोह में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के हाथों शिलान्यास किया गया था। उस समय उम्मीद जताई गई थी कि जल्द ही दंत मरीजों को अत्याधुनिक सुविधाएं मिलेंगी लेकिन इमारत लगभग तैयार होने के बावजूद अस्पताल के दरवाजे आज तक मरीजों के लिए नहीं खुले हैं।
अस्पताल का निर्माण कार्य लगभग पूर्ण हो चुका है लेकिन आवश्यक चिकित्सा उपकरणों की खरीद के लिए करीब 11 करोड़ रुपये की राशि अब तक उपलब्ध नहीं हो सकी है। परिणामस्वरूप विदर्भ क्षेत्र के सैकड़ों जरूरतमंद दंत मरीजों को आज भी निजी क्लिनिकों में महंगे इलाज का खर्च उठाना पड़ रहा है।
पिछले दिनों जिला नियोजन समिति ने अस्पताल को 3.89 करोड़ रुपये मंजूर किए हैं लेकिन अब तक जारी नहीं किए गए। वहीं दूसरी ओर अस्पताल प्रशासन ने 3.5 करोड़ के 2 प्रस्ताव वैद्यकीय शिक्षा व अनुसंधान विभाग को भेजे हैं। इन प्रस्तावों को भी मंजूरी नहीं मिल सकी है।
डेंटल सुपर स्पेशलिटी अस्पताल शुरू करने के लिए 40 डेंटल चेयर, एक्स-रे मशीनें, कैड-कैम तकनीक, अल्ट्रासोनिक स्केलर सहित अन्य अत्यावश्यक उपकरणों की जरूरत है। इन उपकरणों के बिना मरीजों को उपचार देना संभव नहीं है। महाविद्यालय प्रशासन द्वारा करीब वर्ष भर से निधि के लिए फॉलोअप किया जा रहा है लेकिन समग्र निधि नहीं मिल रही है।
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हालांकि जिला नियोजन समिति से निधि तो मिली है लेकिन इतनी निधि में सभी जरूरतें पूरी नहीं हो सकेंगी, साथ ही निधि मिलने के बाद खरीदी प्रक्रिया में 2-3 महीने का समय लग जाएगा। इस हालत में मई तक भी अस्पताल के शुरू होने की उम्मीद कम ही नजर आ रही है।
उल्लेखनीय है कि तत्कालीन अधिष्ठाता डॉ. अभय दातारकर के कार्यकाल में निर्माण कार्य सहित निधि के लिए जोरों से प्रयास जारी थे लेकिन अधिष्ठाता के तबादले के बाद से मामला ठंडा पड़ा है। यही वजह है कि इमारत बनकर तैयार है लेकिन कोई उपयोग नहीं हो रहा है।
एक ओर सरकार आम जनता के लिए स्वास्थ्य सेवाएं मजबूत करने की बात करती है वहीं मात्र 11 करोड़ रुपये के अभाव में एक महत्वपूर्ण स्वास्थ्य परियोजना का वर्षों तक लंबित रहना गंभीर सवाल खड़े करता है। आखिर इस देरी के लिए जिम्मेदार कौन है और मरीजों को अत्याधुनिक दंत सेवाएं कब मिलेंगी? यह प्रश्न अब नागरिकों के साथ-साथ दंत चिकित्सा क्षेत्र के विशेषज्ञ भी उठा रहे हैं।