नागपुर: 20 वर्षों से सिर्फ कागजों पर दौड़ रहा ट्रांसपोर्ट सिस्टम, 25,567 करोड़ का नया CMP बना ‘हसीन सपना’
नागपुर में दशकों से प्रस्तावित बस और फ्रेट टर्मिनल केवल फाइलों तक सीमित। प्रशासन ने अब 25,567 करोड़ का नया CMP पेश किया, लेकिन धरातल पर बुनियादी ढांचा अब भी शून्य
Nagpur Comprehensive Mobility Plan News: देश की अर्थव्यवस्था में अग्रणी भूमिका निभा रहे शहरों में नागपुर का नाम शामिल हो चुका है। हालांकि, जिस गति से शहर ने अपनी आर्थिक स्थिति ऊंची की है, उतनी ही स्पीड से शहर का ट्रांसपोर्ट पब्लिक व फ्रेट सिस्टम भी गर्त में समाता रहा। ऐतिहासिक शहर से स्मार्ट सिटी की ओर बढ़ रहे इस शहर का ट्रांसपोर्ट सिस्टम बद से बदतर होता जा रहा है।
वजह है, पिछले वर्षों से सिर्फ कागजों पर दौड़ रहे शहर के बाहर प्रस्तावित बस और फ्रेट टर्मिनल। यदि पिछले वर्षों में भी इस योजना को धरातल पर ला दिया जाता तो आज शहर की सड़कों को हर दिन भारी वाहनों के वजन से राहत दी जा सकती थी। इस राहत का सीधा असर हर दिन घर से निकलने वाले नागपुरवासियों पर होता। फिर क्यों परोस दिया यही हसीन सपना
महानगर पालिका मनपा और नागपुर सुधार प्रन्यास एनआईटी के योजनाकारों ने एक बार फिर शहरवासियों के सामने २५,५६७ करोड़ का हसीन सपना परोस दिया। महामेट्रो के माध्यम से २०२५-२०५४ के लिए पेश किया गया नया कॉम्प्रिहेंसिव मोबिलिटी प्लान सीएमपी दरअसल पुरानी विफलताओं पर नई चमक चढ़ाने जैसा है।
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पिछले दशकों से हर योजना में बस टर्मिनल और फ्रेट टर्मिनल का जिक्र तो होता है, लेकिन जमीन पर एक ईंट तक नहीं रखी गई। प्रशासन की इस नाकामी का खामियाजा आज लाखों शहरवासी हर दिन दमघोंटू ट्रैफिक और जानलेवा जाम के रूप में भुगत रहे हैं।
दशकों से सिर्फ घोषणा, मंशा पर उठते सवाल हैरानी की बात यह कि पिछले 20 वर्षों से शहर के विकास का ढोल पीटा जा रहा है, लेकिन बुनियादी परिवहन ढांचा आज भी वहीं खड़ा है जहां वह दो दशक पहले था। चाहे पारसोडी और खैरी के बस टर्मिनल हों या ऑटोमोटिव चौक और कापसी के फ्रेट टर्मिनलइनका जिक्र हर सरकारी फाइल में कॉपीपेस्ट किया जाता है।
यदि पिछले 10 वर्षों में भी इन टर्मिनलों का निर्माण कर लिया गया होता, तो आज शहर के भीतर भारी वाहनों का प्रवेश बंद होता और आम जनता को ट्रैफिक से बड़ी राहत मिल चुकी होती सवाल उठता है कि क्या प्रशासनिक एजेंसियां सिर्फ घोषणाएं करने के लिए बनी हैं या उनकी मंशा कभी काम करने की थी ही नहीं
