अथर्व नानोरे हत्याकांड के आरोपी जय यादव, केतन उर्फ कुणाल रमेश शाहू और आयुष मोहन शाहू (सोर्स: सोशल मीडिया)
Atharva’s Father Dilip Nanore Statement: नागपुर का अथर्व नानोरे अपहरण और हत्याकांड अब केवल एक अपराध की खबर नहीं, बल्कि भरोसे के कत्ल की एक ऐसी कहानी है जिसने पूरे शहर को सन्न कर दिया है। जिस जय यादव को अथर्व ‘भैया’ कहकर पुकारता था और जिसके साथ वह हंसी-मजाक करता था, उसी जय ने चंद रुपयों की खातिर मासूम का गला घोंट दिया।
अथर्व के पिता दिलीप नानोरे ने रुंधे गले से बताया कि जय का बड़ा भाई वीरू उनके यहां काम करता था। घर से कुछ दूरी पर ही यादव परिवार का मकान है। कई साल से साथ होने के कारण दोनों के पारिवारिक संबंध थे। इसलिए जय का भी उनके घर पर आना-जाना था। घर के छोटे-मोटे काम वह जय से ही करवा लिया करते थे। अथर्व उसे बड़ा भाई मानता था। भैया-भैया कहकर उसके साथ हंसी-मजाक करता था लेकिन वही इतना बड़ा विश्वासघात करेगा यह कभी सपने में भी नहीं सोचा था।
दिलीप नानोरे ने बताया कि अथर्व के लापता होने के बाद खुद जय और उसका भाई वीरू भी अन्य लोगों के साथ तलाश में जुट गए थे। यहां तक गिट्टीखदान थाने में शिकायत दर्ज करवाने के समय भी जय साथ था, लेकिन वह केवल भीतर की जानकारी ले रहा था। 3 महीने पहले ही वीरू की शादी हुई है। यादव परिवार के पास पैसे नहीं थे। तब उसके पिता ने आकर रकम की मांग की थी।
दिलीप ने कहा कि मैंने बिना कुछ सोचे वीरू को 1 लाख रुपये उधार दे दिए। कई बार इस परिवार पर मैंने एहसान किया, लेकिन उसका प्रतिफल यह मिलेगा, कभी सोचा नहीं था। न तो मैंने और न ही मेरे बच्चे ने उनका कुछ बिगाड़ा था।
दिलीप का आरोप है कि यादव परिवार के और भी सदस्य इस वारदात में शामिल थे। उनसे भी कड़ी पूछताछ की जानी चाहिए। वीरू और जय हर समय उनके साथ बने हुए थे। उन्हें परिसर में नहीं रहने देना चाहिए अन्यथा कोई बड़ी घटना हो जाएगी।
नागपुर पुलिस अधिकारियों के अनुसार आरोपियों ने केवल अथर्व का अपहरण कर फिरौती वसूलने की प्लानिंग की थी। इसीलिए मूर्छित करने वाला स्प्रे भी खरीदा था। पकड़े जाने से बचने के लिए जय और आयुष ने नए मोबाइल फोन और सिमकार्ड भी खरीदे थे। इन फोन और सिम का उपयोग दिलीप से फिरौती मांगने के लिए किया जाना था। खरीदे गए स्प्रे का असर नहीं हुआ और जय ने अथर्व के शरीर पर बैठकर उसका गला घोंट दिया। शव को गाड़ी में छोड़ आयुष और कुणाल अपने घर चले गए, लेकिन जय वापस उसी मंदिर में पहुंचा जहां शोभायात्रा का समापन होना था। शोभायात्रा महाप्रसाद के लिए दिलीप 2 बोरा आलू लाए थे।
अथर्व के शव को ठिकाने लगाने के लिए जय ने दूसरे दिन उसी बोरे का इस्तेमाल किया। असल में किसी ने उस पर संदेह भी नहीं जताया था। यही कारण था कि मामूली पूछताछ के बाद जय को छोड़ दिया गया। पुलिस ने पहले ही अनुमान लगाया लिया था कि अथर्व का अपहरण करने वाला कोई करीबी व्यक्ति होगा। ऐसे में हर अधिकारी को अलग-अलग जिम्मेदारी सौंपी गई। सभी दिशा से जांच करने के बाद भी कुछ हाथ नहीं लगा।
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रविवार की रात एक इमारत में लगे सीसीटीवी कैमरे में जय और अथर्व साथ दिखाई दिए। आखिर पुलिस ने उसी पर ध्यान केंद्रित किया। जय खुद को बचाने के लिए कभी विनी का नाम ले रहा था, तो कभी इरफान का। उन लोगों से भी पूछताछ की गई, लेकिन वारदात से कोई लेना-देना नहीं था। तब तक जय का सीडीआर भी आ चुका था। उसके लगातार आयुष और कुणाल के संपर्क में होने का पता चला। तीनों से अलग-अलग कमरों में पूछताछ की गई। जय लगातार अपना बयान बदल रहा था, लेकिन जब आयुष और कुणाल सामने आए तो वह समझ गया कि अब भेद खुल चुका है लेकिन उसके चेहरे पर शिकन तक नहीं थी।
कई बाजीराव पड़ने के बावजूद उसकी आंख से एक बूंद नहीं निकली। उसने पुलिस से कहा कि मुझे रोना नहीं आता। दिलीप से 50 लाख फिरौती वसूलने के बाद आरोपी आपस में 15-15 लाख रुपये बांटने वाले थे। बाकी बचे 5 लाख रुपये से अय्याशी करने की प्लानिंग थी।