शराब की दुकानें बंद (सौजन्य-सोशल मीडिया)
Nagpur Bar Owners Association: बार को एक ‘चोखा’ धंधा माना जाता रहा है। बार लेने के लिए लोग कभी पैसे फेंकने को तैयार रहते थे तो कभी ‘दबंग’ लोगों की पैरवी से बार लेते थे। बार में कमाई सोच लोग पैसे लगाने से कतराते भी नहीं थे। यही कारण है कि देखते-देखते शहर में बारों की बाढ़ सी आ गई है। कुछ गलियां तो ‘बार गली’ के रूप में पहचान बनाने लगी हैं। कई चौराहों पर हर कोने में बार हुआ करता है। इस बीच सरकार को भी लत लग गई कि बार से अच्छा खासा पैसा वसूल किया जा सकता है।
साल-दर-साल शुल्क में वृद्धि होती गई। अब हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि संचालकों को यह धंधा बेकार लगने लगा है और वे धंधे से बाहर निकलने लगे हैं। इस वित्तीय वर्ष के लिए जब 11।50 लाख रुपये फीस की गई तो लगभग 45 बार संचालकों ने हाथ खड़े कर दिए। उनका कहना है कि वैट, जीएसटी, लाइसेंस फीस और टीसीएस भरते-भरते उनका दम निकल गया है और वे धंधे से तौबा कर रहे हैं।
कारोबारियों ने बताया कि एक ओर वार्षिक शुल्क में लगभग 15 फीसदी की वृद्धि कर दी गई है। नागपुर शहर में आज एक लाइसेंस के लिए लगभग 11.50 लाख रुपये लग रहे हैं। इसके ऊपर 10 फीसदी वैट लागू कर दिया गया है। वैट की यह दर केवल बार पर ही लागू है, दुकानों में यह दरें लागू नहीं हैं।
इस कारण बार में शराब महंगा हो जाती है, जबकि दुकानों में सस्ती। लोग दुकानों से माल लेने को प्राथमिकता देते हैं। बार का सेल दिनोंदिन कम होता जा रहा है। इतना ही नहीं, 5 फीसदी जीएसटी और अब 2 फीसदी टीसीएस भी लागू कर दिया गया है। आखिर एक बार मालिक कितना बोझ उठा सकता है।
बार संचालकों की शुक्रवार को हुई बैठक में संचालकों में गुस्सा था। उनका कहना है कि एक बार में कम से कम 8-10 लोगों को रोजगार मिलता है। ऐेसे में शहर में 1,190 और राज्य में 17,000 बार संचालित हो रहे हैं। इससे अंदाज लगाया जा सकता है कि प्रत्यक्ष रूप से रोजगार देने वाले को ही तंग किया जा रहा है।
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परमिट रूम बार एसोसिएशन के राजीव जायस्वाल कहते हैं कि एक ओर राजस्व देने वाले बार पर बोझ बढ़ाया जा रहा है, जबकि अवैध रूप से ढाबों, रेस्टोरेंट और अन्य स्थानों पर शराब उपलब्ध कराने वालों पर प्रशासन का कोई अंकुश नहीं है। अगर इन स्थानों पर कंट्रोल होगा तो लोग वापस आएंगे लेकिन इसमें किसी की इच्छा नहीं है क्योंकि यहां से सरकार को कोई राजस्व नहीं मिलता है।
बार का राजस्व बढ़ाने के लिए प्रशासन की ओर से कोई गंभीर प्रयास ही नहीं किए जाते हैं। बार पर टाइमिंग से लेकर तमाम प्रकार के प्रतिबंध थोप दिए जाते हैं, जबकि अवैध रूप से शराब परोसने वालों को खुली छूट मिली हुई है। कहीं न कहीं इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने के लिए प्रशासन को जागृत होना होगा।