

Nagpur Hospital News: जब से दक्षिण-मध्य एशिया में युद्ध शुरू हुआ है तब से भारतीय दवा उत्पादक कंपनियों का उत्पादन प्रभावित हुआ है। कैंसर के उपचार की दवाइयां बनाने के लिए 60 फीसदी से अधिक कच्चा माल चीन से आयात होता है लेकिन यह आयात ठप हो गया है। इसका सीधा असर शासकीय वैद्यकीय महाविद्यालय व अस्पताल के कैंसर विभाग पर हो रहा है। मरीजों को करीब महीनेभर से कैंसर की दवाइयां नहीं मिल रही हैं।
इस वजह से मरीजों की वेदना बढ़ती जा रही है। जिन दवाओं की कमी है उनमें सिस्प्लैटिन व कार्बोप्लैटिन प्रमुख हैं। सिस्प्लैटिन कीमोथेरेपी की दवा है। इसका फेफड़े, ओवरी, सर्वाइकल, सिर-गर्दन, मूत्राशय आदि कैंसर में उपचार के लिए उपयोग किया जाता है। यह दवा कैंसर कोशिकाओं को बढ़ने और फैलने से रोकती है।
वहीं कार्बोप्लैटिन भी कीमोथेरेपी की दवा है। ओवरी, फेफड़े, स्तन और अन्य कैंसर के उपचार में उपयोगी होती है। इससे कैंसर कोशिकाओं की वृद्धि को रोका जाता है। मरीजों के अनुसार जोलेड्रोनिक एसिड 4 मिग्रा, ट्रैस्टुजुमैब 575 मिग्रा, जी-सीएसएफ 300 माइक्रोग्राम, बेवासिजुमैब 300 मि।ग्रा भी उपलब्ध नहीं हैं। दवाओं के अभाव में हर दिन 15 से 20 मरीजों को लौटाया जा रहा है।
पेशेंट राइट्स फोरम ने वैद्यकीय शिक्षा व संशोधन विभाग के आयुक्त को पत्र में जानकारी देकर इस मामले में हस्तक्षेप की मांग की है। यह पत्र मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और चिकत्सा शिक्षा मंत्री को भी भेजा गया है। फोरम के एड. किशोर वैरागडे ने कहा है कि सरकारी अस्पतालों में कीमोथेरेपी के लिए आवश्यक इंजेक्शन और दवाओं का अभाव के चलते मरीजों की जान खतरे में आ चुकी है। फोरम ने दवा खरीद और आपूर्ति प्रक्रिया की जांच करने व मरीजों को आपात निधि उपलब्ध कराने की मांग की है।
इस संबंध में मेडिकल के महात्मा फुले जनस्वास्थ्य योजना के समन्वयक डॉ. विजय मोहबिया ने बताया कि कंपनियों के साथ लगातार बातचीत शुरू है। 15 दिन में स्थिति सामान्य होने का आश्वासन दिया गया है। दवाओं के दाम बढ़ने की भी संभावना बनी हुई है। मरीजों को शासकीय योजना के तहत दवाइयां उपलब्ध कराने के लिए पूरा प्रयास किया जा रहा है।