मेयो: 1,360 बेड के लिए और कितना इंतजार; बजट भी कम, पुरानी सीटों के अनुसार पद मान्यता
- Written By: नवभारत डेस्क
- 60 सीटें स्नातक की 1967 में हुआ करती थीं
- 200 सीटें अब हो गईं
- 40 सीटें PG की थीं पहले
- 135 अब हो गईं
- 870 बेड की संख्या
नागपुर. इंदिरा गांधी शासकीय वैद्यकीय महाविद्यालय व अस्पताल (मेयो) में पिछले वर्षों में अनेक बदलाव हुए लेकिन इनके अनुरूप सुविधाएं नहीं मिली हैं. मैन पावर की कमी गंभीर समस्या बनी हुई है. स्नातक और स्नातकोत्तर की सीटें तो बढ़ीं लेकिन पद निर्मिति अब भी पुरानी सीटों के अनुसार ही है. बजट भी इतना कम है कि मरीजों को दवाई तक नहीं मिल पाती. प्रशासन द्वारा गंभीरता नहीं दिखाए जाने का ही नतीजा है कि स्वास्थ्य सहित प्रशासनिक व्यवस्था पर असर पड़ रहा है.
मेयो में 1967 में एमबीबीएस की 60 सीटें हुआ करती थीं. वहीं स्नातकोत्तर की 40 सीटें थीं लेकिन अब स्नातक की कुल सीटें 200 और स्नातकोत्तर की 135 हो गई हैं. 60 सीटों के अनुसार मेयो में बेड की संख्या 594 थी लेकिन धीरे-धीरे बढ़ाते हुए यह 870 तक पहुंच गई है. नेशनल मेडिकल कमीशन के अनुसार सीटों की संख्या के तहत मेयो में 1,360 बेड होने चाहिए लेकिन बढ़ी हुईं सीटों के लिए और इंतजार करना पड़ सकता है.
पिछले दिनों उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने मेयो को 200 करोड़ रुपए देने का निर्णय लिया. इस निधि से मेडिसिन कॉम्प्लेक्स बनाया जाना है. 6 मंजिला इमारत में मेडिसिन के विभाग सहित सेंट्रल लैब, वार्ड, आईसीयू बनाए जाएंगे. हालांकि मेडिसिन विंग के प्रस्ताव को मंजूरी तो मिल गई है लेकिन निर्माण कार्य की शुरुआत कब होगी, यह अधिकारी भी नहीं जानते.
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पुरानी संरचना में बदलाव से होगा सुधार
मेयो में अधिकारी, कर्मचारियों की नियुक्ति 60 सीटों के आधार पर है. पुरानी संरचना में अब तक सुधार नहीं किया गया है. यदि 1,360 बेड किए जाते हैं तो फिर कर्मचारियों सहित अधिकारियों की संख्या बढ़ेगी लेकिन इतने वर्षों में सरकार ने कभी गंभीरता नहीं दिखाई. अस्पताल में वार्डों का अभाव है. 100 से अधिक पुराने वार्डों में मरीजों को भर्ती किया जाता है, जबकि वीएनआईटी द्वारा किए गए स्ट्रक्चरल ऑडिट में पुराने वार्डों को अनुपयोगी करार दिया गया है.
नेशनल मेडिकल कमीशन के मापदंड के अनुसार अस्पताल में सेंट्रल क्लिनिकल लैब का अभाव है. यह लैब 24 घंटे कार्यरत होनी चाहिए. मेयो का परिसर विस्तारित है लेकिन सभी एक जगह नहीं है. यही वजह है कि स्वच्छता एक गंभीर समस्या बनी हुई है. स्थानीय खरीदी का बजट काफी कम है. यही वजह है कि दवाइयों की हमेशा किल्लत बनी रहती है.
