

Nagpur High Court Caste Certificate: नागपुर हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए यह स्पष्ट किया है कि यदि किसी सरकारी कर्मचारी का जाति प्रमाणपत्र जांच में अमान्य हो जाता है लेकिन सेवानिवृत्ति तक उसे 'अधिसंख्य पद' पर स्थानांतरित नहीं किया गया है तो उसके पेंशन और सेवानिवृत्ति लाभों को रोका नहीं जा सकता है।
चंद्रकांत निखारे ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की। याचिकाकर्ता ने याचिका में बताया कि 21 जून 1997 को अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित पद पर क्लर्क-कम-टाइपिस्ट के रूप में नियुक्त किया गया था। उन्होंने नौकरी के लिए 'हलबा' अनुसूचित जनजाति का प्रमाणपत्र प्रस्तुत किया था। नौकरी ज्वाइन करने के बाद 2013 में उनके जाति प्रमाणपत्र को सत्यापन के लिए अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र जांच समिति के पास भेजा गया था।
जांच के दौरान पुलिस विजिलेंस सेल को जन्म प्रमाणपत्रों और स्कूल लीविंग सर्टिफिकेट में याचिकाकर्ता के दादा, पिता और भाई की जाति 'कोष्टी' दर्ज मिली जो 'विशेष पिछड़ा वर्ग' के अंतर्गत आती है। इन विपरीत प्रविष्टियों के आधार पर 21 दिसंबर 2018 को जांच समिति ने उनका 'हलबा' जाति का दावा खारिज कर दिया था।
याचिकाकर्ता ने समिति के फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी लेकिन इसी याचिका के लंबित रहने के दौरान वे अपनी सेवानिवृत्ति आयु पूरी कर रिटायर हो गए। बाद में याचिकाकर्ता ने अपनी जाति साबित करने का दावा वापस ले लिया और न्यायालय से केवल यह गुहार लगाई कि उनके पेंशन आदि लाभों को न रोका जाए।
राज्य सरकार की ओर से पेश हुए सरकारी वकील ने इसका कड़ा विरोध करते हुए तर्क दिया कि चूंकि याचिकाकर्ता ने अनुसूचित जनजाति के आरक्षित पद पर नौकरी प्राप्त की थी और वे अपना जाति प्रमाणपत्र प्रस्तुत करने में विफल रहे, इसलिए उनकी सेवाएं समाप्त कर दी जानी चाहिए थीं।
दोनों पक्षों की दलीलों के बाद अदालत ने राज्य सरकार के 21 दिसंबर 2019 और 14 दिसंबर 2022 के सरकारी प्रस्तावों का गहनता से अवलोकन किया, कोर्ट ने कहा कि 2018 में जाति प्रमाणपत्र अमान्य होने के बावजूद विभाग ने याचिकाकर्ता को कभी भी 'अधिसंख्य पद पर स्थानांतरित नहीं किया और वे सीधे वलर्क के पद से ही सेवानिवृत्त हुए।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सेवानिवृत्ति से पहले याचिकाकर्ता को न तो कोई कारण बताओ नोटिस' दिया गया था और न ही उनके खिलाफ कोई विभागीय जांच शुरू की गई थी। पूर्व के फैसलों का हवाला देते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि इन परिस्थितियों में कर्मचारी को उसके पैशनरी लाभों से वंचित करने का कोई औचित्य नहीं बनता है।