नागपुर मनपा में हड़कंप: 73 कर्मचारियों पर लटकी जांच की तलवार, क्या रिटायरमेंट के बाद नहीं मिलेंगे पैसे?

NMC Corruption: नागपुर महानगरपालिका के 73 अधिकारियों और कर्मियों पर भ्रष्टाचार और लापरवाही के गंभीर आरोप हैं। विभागीय जांच में देरी से प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं।
Nagpur Municipal Corporation: नागपुर मनपा के 73 कर्मचारियों पर लटकी जांच की तलवार, क्या रिटायरमेंट के बाद नहीं मिलेंगे पैसे?
नागपुर महानगरपालिका (सोर्स: सोशल मीडिया)
Published on
Updated on

NMC Employees Investigation: नागपुर महानगरपालिका हर समय बेतरतीब कार्यप्रणाली के चलते सुर्खियों में रही है। यहां तक कि हर दूसरे दिन कोई न कोई बखेड़ा उजागर होता है। एक दिन पहले ही जोनल कार्यालय में सम्पत्ति कर कम कराने को लेकर भ्रष्टाचार प्रतिबंधक विभाग की ओर से कार्रवाई की गई। इसी तरह से गत समय महानगरपालिका में कई गड़बड़ियों को अंजाम देने वाले लगभग 73 अधिकारी और कर्मचारियों की विभागीय जांच होने की जानकारी उजागर हुई है।

आलम यह है कि विभागीय जांच पूरी नहीं होने के कारण संबंधित अधिकारी और कर्मचारियों पर सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाले वित्तीय लाभ पर भी तलवार लटक रही है। साथ ही विभागीय जांच में हो रही देरी पर भी सवाल उठने लगे हैं।

गंभीर आरोपों के घेरे में कर्मचारी

जांच प्रक्रिया में हो रही अत्यधिक देरी के कारण दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने में नागपुर मनपा प्रशासन विफल साबित हो रहा है। बताया जाता है कि इन 73 कर्मियों पर कामकाज में लापरवाही, बिना अनुमति के गैर हाजिर रहना, आर्थिक अनियमितताएं और सीधे तौर पर रिश्वत मांगने जैसे गंभीर आरोप लगे हैं। नियमों के अनुसार, प्रथमदृष्टया दोषी पाए जाने पर इनके विरुद्ध विभागीय जांच का प्रस्ताव रखा जाता है और आयुक्त की अनुमति के बाद आरोप पत्र दाखिल किया जाता है। जांच की प्रक्रिया इतनी धीमी है कि कई मामले पिछले कुछ वर्षों से लंबित पड़े हैं। इस देरी का मुख्य कारण विभागीय जांच विभाग में कर्मचारियों की कमी को बताया जा रहा है। जांच पूरी न होने का फायदा उठाकर कई आरोपी कर्मचारी न केवल सेवा में बने रहते हैं बल्कि उनका स्थानांतरण भी हो जाता है या वे सेवानिवृत्ति के करीब पहुंच जाते हैं। ऐसे में दोषी पाए जाने के बावजूद उन्हें वास्तविक सजा नहीं मिल पाती।

साक्ष्यों के कमजोर होने का खतरा

विशेषज्ञों और सूत्रों का मानना है कि जांच में देरी होने से सबूत और गवाहों के कमजोर होने का खतरा बना रहता है। यदि समय रहते कार्रवाई नहीं की गई तो दोषियों के छूटने की संभावना बढ़ जाती है। इसका सीधा विपरीत प्रभाव उन ईमानदार कर्मचारियों पर पड़ता है जो निष्ठा से अपना काम कर रहे हैं। यहीं कारण है कि जांच की इस सुस्त रफ्तार ने नागरिकों के मन में भी सवाल खड़े कर दिए हैं।

लोगों का मानना है कि यदि भ्रष्ट और कामचोर कर्मचारियों पर तत्काल कार्रवाई नहीं होती तो प्रशासनिक अनुशासन पूरी तरह ध्वस्त हो जाएगा और जनता का विश्वास भी कम होगा। बताया जाता है कि प्रक्रिया को पूरी करने के लिए बाकायदा अधिकारियों की विशेष नियुक्तियां की गई हैं। इसके बावजूद जांच कछुआ गति से की जा रही है।

Navbharat Live: Hindi News
navbharatlive.com