बिना मजबूत आधार के LOC जारी करने पर कोर्ट सख्त; नागपुर SBL धमाका मामले में न्यायाधीशों की बेंच ने दिया अहम आदे

Nagpur SBL Company Blast: काटोल स्थित एसबीएल कंपनी ब्लास्ट मामले में हाई कोर्ट ने दुबई निवासी अतुल गुप्ता के खिलाफ जारी लुक आउट सर्कुलर पर रोक लगा दी।
Court cracks down on issuing LOCs without solid grounds; Judges issue crucial order in Nagpur SBL blast case
काटोल स्थित एसबीएल कंपनी ब्लास्ट,(सोर्सः सोशल मीडिया)
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Nagpur SBL Company Blast High Court Stay: नागपुर काटोल के रावलगांव स्थित एसबीएल कंपनी में हुए ब्लास्ट के मामले में जांच के बाद कई लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई। यहां तक कि गैर कार्यकारी संचालक दुबई निवासी अतुल गुप्ता के खिलाफ लुक आउठ सर्कुलर जारी किया जिसे चुनौती देते हुए गुप्ता की ओर से हाई कोर्ट में फौजदारी रिट याचिका दायर की गई।

याचिका पर सुनवाई के बाद न्यायाधीश उर्मिला जोशी फालके और न्यायाधीश निवेदिता मेहता की बेंच ने याचिकाकर्ता को राहत प्रदान की। कोर्ट ने आदेश में कहा कि जांच एजेंसियां किसी भी व्यक्ति के खिलाफ बिना किसी ठोस कारण या गिरफ्तारी से बचने के सबूत के 'लुक आउट सर्कुलर' (एलओसी) जारी नहीं कर सकती हैं। इसे देखते हुए कोर्ट ने दुबई के निवासी अतुल गुप्ता के खिलाफ जारी एलओसी पर रोक लगा दी है।

FIR के 6 दिन बाद जारी हुआ लुकआउट सर्कुलर

एफआईआर दर्ज होने के 6 दिन बाद ही एलओसी एसबीएल कंपनी विस्फोटकों के निर्माण के कार्य में संलग्न है। 1 मार्च 2026 को इस कंपनी के निदेशकों और अन्य कर्मचारियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 105, 125 (a), 125 (b) और 288 के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी। इस प्रकरण में अतुल गुप्ता को आरोपी नंबर 15 बनाया गया है।

पुलिस ने एफआईआर दर्ज होने के महज 6 दिन बाद ही 7 मार्च 2026 को अतुल गुप्ता के खिलाफ लुक आउट सर्कुलर जारी कर दिया था। याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता अक्षय नाईक ने अदालत को बताया कि अतुल गुप्ता कंपनी के बोर्ड में केवल एक गैर-कार्यकारी नामित निदेशक हैं। उन पर लगा आरोप केवल BNS की धारा 106 तक सीमित है जो कि पूरी तरह से एक जमानती अपराध है।

सर्कुलर के कारण भारत आने में असमर्थ

वरिष्ठ अधिवक्ता ने अदालत के संज्ञान में लाया कि अतुल गुप्ता दुबई के निवासी है और वह जांच एजेंसी के साथ पूरा सहयोग करना चाहते हैं लेकिन इस अनुचित लुक आउट नोटिस की वजह से वे भारत आने में असमर्थ है। उन्होंने तर्क दिया कि एलओसी जारी करने के लिए जांच एजेंसी के पास ऐसा कोई सबूत होना चाहिए जो यह साबित करे कि आरोपी जानबूझकर गिरफ्तारी से बच रहा है।

जानबूझकर गिरफ्तारी से भाग रहे व्यक्ति पर होता है लागू

  • सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के वकील ने एलओसी का बचाव करते हुए कहा कि जांच के लिए याचिकाकर्ता की उपस्थिति आवश्यक है।
  • हालांकि सरकारी वकील ने अदालत के सामने ईमानदारी से यह स्वीकार किया कि उनके पास ऐसा कोई सबूत नहीं है जो यह साबित कर सके कि अतुल गुप्ता गिरफ्तारी से बच रहे हैं।
  • इस पर हाई कोर्ट ने 'शीविक इंद्रजीत चक्रवर्ती बनाम अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक' (2024) मामले के ऐतिहासिक फैसले का प्रमुखता से हवाला दिया।
  • अदालत ने कहा कि एलओसी एक दंडात्मक और बाध्यकारी कदम है जो व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 21' के तहत गारंटीकृत 'यात्रा करने के मौलिक अधिकार' में सीधा हस्तक्षेप करता है।
  • अदालत ने स्पष्ट किया कि एलओसी केवल तभी जारी किया जा सकता है जब कोई व्यक्ति जानबूझकर गिरफ्तारी से भाग रहा हो या ट्रायल कोर्ट में पेश न हो रहा हो, इसे एक सामान्य प्रक्रिया के रूप में जारी नहीं किया जा सकता।
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