नागपुर भूमि विवाद में हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, प्राकृतिक न्याय की अनदेखी पड़ी भारी, सरकार का आदेश निरस्त
Nagpur High Court: नागपुर हाई कोर्ट ने बिना सुनवाई के भूमि आवंटन रद्द करने के राज्य सरकार और प्रन्यास के आदेशों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने इसे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ बताया।
- Written By: अंकिता पटेल
नागपुर हाई कोर्ट, भूमि आवंटन,(सोर्स: सोशल मीडिया)
Nagpur High Court Land Allotment: नागपुर ‘ट्रस्ट एडुवेंचर्स’ ने 24 सितंबर 2018 को प्रन्यास द्वारा आयोजित एक नीलामी में सबसे बड़ी बोली लगाकर खसरा नंबर 155/1 की भूमि प्राप्त की थी। हालांकि बाद में एक दीवानी मुकदमे में सिविल कोर्ट द्वारा इस भूमि के हस्तांतरण पर रोक लगा दी गई। इसके बाद याचिकाकर्ता और प्रन्यास के बीच बातचीत हुई।
परिणामस्वरूप 6 मई 2022 के एक आदेश के तहत कंपनी को मौजा इन्दोरा में वैकल्पिक भूमि (खसरा नंबर 3, 5, 7/2 और 8/2, कुल क्षेत्रफल 2221.11 वर्ग मीटर) आवंटित की गई। विवाद तब खड़ा हुआ जब 24 फरवरी 2023 को राज्य सरकार के नगर विकास विभाग के उप सचिव ने एक पत्र जारी कर अचानक इस आवंटन और लीज को रद्द कर दिया।
हाई कोर्ट ने आदेश निरस्त किए
सरकार के इसी पत्र के आधार पर उसी दिन प्रन्यास ने भी आवंटन रद्द करने का अपना आदेश निकाल दिया। इसके खिलाफ हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई। इस पर सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने 24 फरवरी 2023 के आदेशों को खारिज कर दिया। दोनों पक्षों को सुनने के बाद और इस निर्विवाद तथ्य को देखते हुए कि याचिकाकर्ता को सुनवाई का कोई अवसर नहीं मिला, हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता की दलील में वजन पाया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि बिना सुनवाई के आवंटन रद्द करना प्राकृतिक न्याय के स्थापित सिद्धांतों के खिलाफ है। अपने अंतिम फैसले में कोर्ट ने राज्य सरकार और प्रन्यास द्वारा 24 फरवरी 2023 को जारी किए गए दोनों आदेशों को पूरी तरह से रद्द कर दिया।
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सुनवाई का नहीं दिया मौका
अदालत ने इसे ‘प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन माना क्योंकि सरकार ने यह बड़ा फैसला लेने से पहले याचिकाकर्ता को अपना पक्ष रखने का कोई अवसर ही नहीं दिया था। याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता सुनील मनोहर ने न्यायालय के समक्ष यह प्रमुख दलील दी कि सरकार और प्रन्यास ने आवंटन रद्द करने का यह सख्त आदेश याचिकाकर्ता को बिना सुने ही पारित कर दिया, जो कि गैर-कानूनी है।
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राज्य सरकार का पक्ष रख रहे अतिरिक्त सरकारी वकील एस। एम। उके ने अदालत में इस बात को स्वीकार किया और कोई खंडन नहीं किया कि उप सचिव द्वारा आदेश जारी करते समय कंपनी को सुनवाई का मौका नहीं दिया गया था। वहीं NIT के वकील के। पी। महल्ले ने अदालत को बताया कि प्रन्यास ने तो केवल राज्य सरकार के आदेश का पालन किया था।
