बेसा अपार्टमेंट सुसाइड केस में पति, मां-बहन और बहनोई दोषमुक्त; नागपुर कोर्ट का फैसला

Suicide Abetment Case: नागपुर जिला अदालत ने रितु आत्महत्या मामले में पति पंकज खडसे और उसके परिवार को बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा, आत्महत्या के लिए उकसाने के पर्याप्त सबूत नहीं मिले।
Husband, Mother, Sister, and Brother-in-law Acquitted in Besa Apartment Suicide Case; Nagpur Court Verdict
नागपुर कोर्ट फैसला, रितु आत्महत्या केस,(सोर्स: सोशल मीडिया)
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Nagpur Ritu Suicide Case: नागपुर जिला एवं सत्र न्यायाधीश जे.सी. यादव की अदालत ने महत्वपूर्ण फैसले में पंकज खडसे और उनके परिवार के सदस्यों (मां, बहन और बहनोई) को पत्नी रितु को आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोपों से बरी कर दिया। अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 306 और 34 के तहत आरोप साबित करने में विफल रहा। अभियोजन पक्ष के अनुसार पंकज और रितु साथ काम करते थे और उनकी जान-पहचान प्यार में बदल गई, जिसके बाद 2018 में दोनों ने शादी कर ली।

शादी के बाद यह जोड़ा चेन्नई और फिर बेंगलुरु में रहा, लेकिन कोरोना महामारी के दौरान वे नागपुर आ गए और पंकज के परिवार के साथ रहने लगे। 6 अक्टूबर 2021 को रितु ने नागपुर के बेसा इलाके में स्थित जयंती नगरी डी विंग अपार्टमेंट की 7वीं मंजिल से कूदकर अपनी जान दे दी। इस घटना के बाद रितु के पिता ने एफआईआर दर्ज कराई, जिसमें आरोप लगाया गया कि शादी के बाद से ही पंकज और उसके परिवार वाले रितु को प्रताड़ित कर रहे थे।

आरोपियों की ओर से पेश हुई एडवोकेट सुरभि गोडबोले नायडू ने अदालत के समक्ष कई मजबूत कानूनी तर्क रखे। उन्होंने तर्क दिया कि केवल आत्महत्या कर लेने के तथ्य मात्र से साक्ष्य अधिनियम की धारा 113-A के तहत अदालत सीधे तौर पर आरोपियों के खिलाफ धारणा नहीं बना सकती। किसी व्यक्ति को आत्महत्या के लिए उकसाने का दोषी ठहराने के लिए आईपीसी की धारा 107 के तहत यह साबित करना आवश्यक है कि आरोपी ने साजिश रची, जानबूझकर मदद की या उकसाने का कोई सीधा कृत्य किया। अभियोजन पक्ष को यह साबित करना होता है कि आत्महत्या से ठीक पहले आरोपी ने मृतक को इस हद तक प्रताड़ित या परेशान किया कि उसके पास अपनी जान देने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा था।

वॉट्सएप मैसेज को साक्ष्य मानने से इनकार

सबसे अहम सबूत के तौर पर पेश किए गए वॉट्सएप मैसेज को बचाव पक्ष ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह एक इलेक्ट्रॉनिक सक्ष्य है और कानूनी मापदंडों व अनिवार्य प्रक्रियाओं का पालन न किए जाने के कारण इसे सबूत के तौर पर नहीं माना जा सकता, बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि वैवाहिक जीवन में होने वाले सामान्य मनमुटाव या दुर्थवहार की एक-दो घटनाओं को आत्महत्या के लिए उकसाने का आधार नहीं बनाया जा सकता, दोनों पक्षों की दलीलों के बाद जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने सभी आरोपियों को निर्दोष करार देते हुए बरी कर दिया।

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