BJP Internal Dissent:नागपुर मनपा चुनाव (सोर्सः सोशल मीडिया)
Nagpur Municipal Election: मनपा चुनाव में इस बार मुकाबला बेहद दिलचस्प और चुनौतीपूर्ण बन गया है। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस के गढ़ नागपुर में भाजपा को किसी बाहरी विपक्षी दल से अधिक अपने ही पुराने, कर्मठ कार्यकर्ताओं की बगावत और कड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा है। सूत्रों के अनुसार, बाहरी उम्मीदवारों को टिकट दिए जाने के फैसले ने पार्टी के भीतर असंतोष को और गहरा कर दिया है।
वर्षों से संगठन के लिए ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं का एक बड़ा वर्ग अब खुलकर विरोध में उतर आया है। कई उम्मीदवारों का कहना है कि लंबे समय तक पार्टी के लिए समर्पित रहने के बावजूद उनके साथ अन्याय हुआ है। नाराज़ कार्यकर्ताओं का स्पष्ट संदेश है कि वे अब केवल ‘सतरंजियां उठाने और गद्दी बिछाने’ की भूमिका में नहीं रहेंगे, बल्कि इस कथित अन्याय के खिलाफ अंत तक लड़ाई लड़ेंगे।
इस चुनाव में सबसे बड़ा उलटफेर वे निर्दलीय उम्मीदवार कर सकते हैं, जो लंबे समय तक आरएसएस और भाजपा के समर्पित कार्यकर्ता रहे हैं। इन प्रत्याशियों को न केवल स्थानीय मतदाताओं का समर्थन मिल रहा है, बल्कि संघ पृष्ठभूमि का नैतिक समर्थन भी उनके साथ जुड़ता दिख रहा है। दूसरी ओर, ग्राउंड रिपोर्ट्स के अनुसार निर्दलीय और अन्य दलों के संयुक्त पैनलों की स्थिति लगातार मजबूत होती जा रही है।
कार्यकर्ताओं का कहना है कि भाजपा ने 63 पूर्व पार्षदों के टिकट काटे हैं, जिनमें से कुछ स्थानों पर बाहरी और विशेष रूप से कांग्रेस से आए लोगों को मौका दिया गया। उनका तर्क है कि यदि सीटिंग-गेटिंग के आधार पर टिकट मिलती, तो वे पूरी ताकत से काम करते, लेकिन पुराने संघर्ष वाले बाहरी उम्मीदवारों के लिए काम करना उन्हें स्वीकार नहीं है।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या भाजपा समय रहते आंतरिक कलह और कार्यकर्ताओं की नाराज़गी को दूर कर पाएगी, या फिर उसे अपने ही घर में ऐतिहासिक चुनौती का सामना करना पड़ेगा? चुनावी नतीजे ही तय करेंगे कि मनपा चुनाव जीत की परंपरा को कायम रखता है या फिर नया राजनीतिक इतिहास रचता है। स्थानीय स्तर पर संगठन और विचारधारा की पकड़ रखने वाले उम्मीदवार अपने पैनल को मजबूत बता रहे हैं और दावा कर रहे हैं कि उन्हें जनता का भरपूर समर्थन मिल रहा है।
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राजनीतिक जानकारों के अनुसार, जहां भाजपा में बगावती सुर तेज हैं, वहीं कांग्रेस में इस बार अपेक्षाकृत अनुशासन देखने को मिल रहा है। नामांकन वापसी के अंतिम दिन 10 पूर्व पार्षदों के साथ-साथ 150 से अधिक कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने अपने उम्मीदवारों के समर्थन में चुनाव मैदान छोड़ दिया।
भाजपा में कार्यकर्ताओं की नाराज़गी को देखते हुए अब प्रत्याशी वरिष्ठ नेताओं की प्रचार रैलियों का इंतज़ार कर रहे हैं। जानकारों का मानना है कि बड़े नेताओं के मैदान में उतरने से कुछ हद तक असंतोष कम हो सकता है, लेकिन इसका चुनावी परिणामों पर कितना असर पड़ेगा, यह मतदान के बाद ही स्पष्ट होगा।