राजस्व रिकॉर्ड से 20,000 एकड़ ‘कुम्हार-खदानें’ गायब, भू-माफियाओं के अतिक्रमण से कारीगर बेहाल
Kumhar Clay Mines Missing News: महाराष्ट्र में कुम्हारों के लिए आरक्षित 20,000 एकड़ खदानें गायब हैं। भू-माफियाओं के कब्जे और सरकारी अनदेखी के कारण पारंपरिक मिट्टी व्यवसाय बंद होने की कगार पर है।
- Written By: आकाश मसने
कॉन्सेप्ट फोटो (सोर्स: AI)
Maharashtra Kumhar Community Crisis: भारतीय कला और संस्कृति का आधार माने जाने वाले कुम्हार समुदाय पर आज अस्तित्व का संकट मंडरा रहा है। एक चौंकाने वाले खुलासे में यह बात सामने आई है कि महाराष्ट्र के राजस्व रिकॉर्ड से करीब 20,000 एकड़ कुम्हार-खदानें (मिट्टी के उत्खनन के लिए आरक्षित भूमि) गायब हो चुकी हैं। भू-माफियाओं द्वारा किए गए अतिक्रमण और प्रशासन की ढुलमुल कार्यशैली के कारण हजारों कारीगरों का पारंपरिक व्यवसाय अब ठप होने की कगार पर है।
आरटीआई से हुआ सनसनीखेज खुलासा
सूचना के अधिकार (RTI) के तहत प्राप्त जानकारी के अनुसार, कुम्हारों के लिए आवंटित खदानों का एक बड़ा हिस्सा अब सरकारी कागजों से नदारद है। गौरतलब है कि राज्य के 80 लाख से अधिक कुम्हार समुदाय में से 85% लोग आज भी अपनी आजीविका के लिए मिट्टी के बर्तन, मूर्तियों और ईंटों के निर्माण पर निर्भर हैं। खदानों के गायब होने का सीधा अर्थ है मिट्टी की अनुपलब्धता, जिससे पूरा व्यवसाय संकट में है।
जांच के आदेश भी फाइलों में दबे
पारंपरिक मूर्तिकार व हस्तकला कारीगर संघ के अध्यक्ष सुरेश पाठक के अनुसार, इस गंभीर मुद्दे पर 2023 में तत्कालीन राजस्व मंत्री ने विभागीय आयुक्तों को जांच के सख्त आदेश दिए थे। विडंबना यह है कि एक साल से अधिक समय बीत जाने के बाद भी न तो कोई जांच रिपोर्ट सार्वजनिक हुई और न ही गायब जमीन का पता लगाया गया। यह स्थिति तब है जब केंद्र सरकार ‘पीएम विश्वकर्मा योजना’ के जरिए इन हस्तशिल्पियों के विकास का दावा कर रही है।
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सर्कुलर और जीआर (GR) केवल कागजों तक सीमित
सरकारी नियमों के अनुसार, कुम्हार कारीगरों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी 700 ब्रास मिट्टी निःशुल्क उत्खनन की अनुमति है। साथ ही, 1998 के एक सरकारी सर्कुलर में प्रावधान था कि यदि आरक्षित खदानों पर अतिक्रमण होता है, तो उन्हें वैकल्पिक भूमि दी जाए। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि न तो अतिक्रमित भूमि मुक्त हुई और न ही वैकल्पिक जमीन का आवंटन किया गया।
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आधुनिकता और पर्यावरण के बीच फंसा समाज
एक तरफ न्यायालय और सरकार पर्यावरण के अनुकूल मिट्टी की मूर्तियों के निर्माण पर जोर दे रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ मूर्तिकारों के पास कच्चा माल (मिट्टी) जुटाने के लिए कोई साधन नहीं बचा है। नागपुर के पारशिवनी, भंडारा और गोंदिया जैसे कुछ ही इलाकों में अब कुम्हारों के पास उनकी आरक्षित जमीन शेष है, जबकि बाकी जगहों पर स्थिति दयनीय है।
कुम्हार समुदाय के नेताओं ने सरकार से मांग की है कि गायब खदानों की तलाश की जाए और भू-माफियाओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई करते हुए कारीगरों को उनका अधिकार वापस दिलाया जाए, अन्यथा यह प्राचीन कला हमेशा के लिए विलुप्त हो जाएगी।
