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22 मार्च : विश्व जल दिवस विशेष, आज भी सिर पर मटका रख मिलों दूर से पानी लाने का संघर्ष !
- Written By: सूर्यप्रकाश मिश्र | Edited By: आंचल लोखंडे
Water Crisis India: विश्व जल दिवस 2026 के अवसर पर जल संकट और महिलाओं पर उसके प्रभाव पर विशेष रिपोर्ट...

Water and Women Empowerment (सोर्सः सोशल मीडिया)
World Water Day: भारत जैसे दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाले पुरुष प्रधान देश में खाना पकाने से लेकर शौचालय तक, घर में पानी है, या नहीं? इसकी व्यवस्था की जिम्मेदारी पीढ़ी दर पीढ़ी औरतें ही संभालती नजर आ रहीं हैं।
आज भी देश के ग्रामीण व दूरदराज के इलाकों में माँ, बहनों और बेटियों को सिर पर मटका रखकर दूर से पानी लाने का संघर्ष दिखाई पड़ता है।
हालाँकि भारत में पेय जल उपलब्धता की परिस्थितियों में कुछ परिवर्तन आया है,लेकिन भारत सहित दुनिया भर के कई देशों में नागरिक साफ़ और नियमित पानी की सप्लाई से वंचित हैं। इसलिए, इस साल 22 मार्च को वर्ल्ड वॉटर डे मनाते हुए, यूनाइटेड नेशंस ने वॉटर मैनेजमेंट में औरतों के एम्पावरमेंट को प्राथमिकता दी है।
महिलाओं पर सबसे ज़्यादा असर
पानी समस्या का सबसे ज्यादा असर महिलाओं पर ही हुआ है। यूनाइटेड नेशंस की रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया भर में 1 अरब से ज़्यादा महिलाएं अभी भी पीने के साफ पानी से दूर हैं। लगभग 1.8 अरब लोगों के घरों के पास पानी नहीं है।
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ऐसे में, हर तीन में से दो घरों में पानी लाने की ज़िम्मेदारी महिलाओं और बच्चियों पर है। 53 देशों के आंकड़ों के मुताबिक, औरतें और लड़कियां हर दिन कुल मिलाकर 250 मिलियन घंटे पानी लाने में बिताती हैं। इस समय का इस्तेमाल पढ़ाई, नौकरी या उनके पर्सनल डेवलपमेंट के लिए किया जा सकता था। इसी तरह गंदे पानी और साफ-सफाई की कमी की वजह से हर दिन करीब 1,000 बच्चों की मौत हो जाती है।
जल संकट से होता है, महिलाओं का शोषण
इसके अलावा, दुनिया के करीब 14 प्रतिशत देशों में वॉटर मैनेजमेंट के फैसले लेने की प्रक्रिया में महिलाओं की बराबर हिस्सेदारी पक्का करने का कोई सिस्टम नहीं है। भारत ने पेय जल के मामले में बहुत तरक्की की है। घरों में नल से पानी पहुँचाने के लिए जलजीवन मिशन को असरदार तरीके से लागू किया गया।
फिर भी महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, यूपी,राजस्थान, गुजरात जैसे बड़े राज्यों एवं देश के ग्रामीण पिछड़े इलाकों में पानी की कमी बनी हुई है, और इसका बोझ सबसे ज़्यादा औरतों पर पड़ता है। यह प्रॉब्लम सिर्फ़ भारत तक ही सीमित नहीं है, बल्कि ग्लोबल लेवल पर भी उतनी ही गंभीर है। इसीलिए इस साल का वर्ल्ड वॉटर डे “पानी और महिलाओं का सशक्तिकरण” की बड़ी थीम के साथ मनाया जा रहा है।
पानी का संकट: वितरण में असमानता
धरती की सतह का लगभग 71 प्रतिशत हिस्सा पानी से भरा है, लेकिन इसका सिर्फ़ 2.5 प्रतिशत ही पीने लायक पानी है। इसका भी बहुत छोटा सा हिस्सा इंसानों के इस्तेमाल के लिए उपलब्ध है।
इसलिए,शुद्ध पानी की उपलब्धता सिर्फ़ एक भ्रम है। क्लाइमेट चेंज, आबादी बढ़ने, इंडस्ट्रियलाइज़ेशन और शहरीकरण ने पानी की मांग बढ़ा दी है, जिससे पानी की उपलब्धता और बंटवारे में बहुत ज़्यादा असमानता आ गई है। इस असमानता से सबसे ज़्यादा असर महिलाओं और लड़कियों पर पड़ता है। इन आंकड़ों से साफ है कि पानी की कमी सिर्फ एक कुदरती मुद्दा नहीं है, बल्कि यह एक सामाजिक, आर्थिक और जेंडर आधारित मुद्दा भी है।
वॉटर मैनेजमेंट में महिलाओं की भागीदारी
जानकारों के मुताबिक वॉटर मैनेजमेंट में महिलाओं की भागीदारी जरूरी है। आज, महिलाएं इंडस्ट्री, पढ़ाई, हेल्थ जैसे कई फील्ड में आगे हैं। वॉटर मैनेजमेंट में उनका अनुभव भी बहुत कीमती है।
हालांकि, वॉटर मैनेजमेंट में यह जेंडर इक्वालिटी लाना अब सिर्फ हमारे देश के लिए ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक ज़रूरत बन गई है। यूनाइटेड नेशंस के मुताबिक, अगर वॉटर मैनेजमेंट में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ती है,तो सर्विसेज़ ज़्यादा सस्टेनेबल और असरदार हो जाती हैं। इसलिए, महिलाओं को ‘पानी ढोने वालों’ की भूमिका से ‘पानी प्लानर’ की भूमिका में लाना ज़रूरी है।
ये भी पढ़े: ‘दुनिया की जरूरतों के मुताबिक बदलें अपना सिलेबस’, उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन ने यूनिवर्सिटीज को दिया खास मंत्र
पानी का अर्थव्यवस्था से संबंध
पानी न सिर्फ़ ज़िंदगी के लिए बल्कि अर्थव्यवस्था में मुख्य भूमिका निभाती है। दुनिया भर में मौजूद ताज़े पानी का लगभग 70 प्रतिशत खेती के लिए इस्तेमाल होता है, जबकि इंडस्ट्री और एनर्जी सेक्टर को भी बहुत ज़्यादा पानी की ज़रूरत होती है।
जिन देशों ने असरदार वॉटर मैनेजमेंट लागू किया है, उन्होंने तेज़ी से इकॉनमिक ग्रोथ देखी है। इज़राइल ने ड्रिप इरिगेशन को सफलतापूर्वक लागू किया है, सिंगापुर ने गंदे पानी का दोबारा इस्तेमाल किया है, नीदरलैंड्स ने बाढ़ कंट्रोल लागू किया है और ऑस्ट्रेलिया ने पानी बचाने की पॉलिसी को सफलतापूर्वक लागू किया है। महाराष्ट्र सहित भारत में भी जल संरक्षण के अनेक उपाय किए जा रहे हैं।
रेनवॉटर हार्वेस्टिंग ज़रूरी
महाराष्ट्र सरकार ने नदी जोड़ परियोजना शुरू की है,ताकि बाढ़ और सूखे दोनों का मुकाबला किया जा सके।महाराष्ट्र में नागपुर गंदे पानी का इंडस्ट्रियल इस्तेमाल करता है, जबकि नवी मुंबई का गंदे पानी का मैनेजमेंट बहुत अच्छा माना जाता है।
इसके अलावा, पेड़ लगाना और पानी बचाना इकोलॉजिकल बैलेंस के लिए ज़रूरी उपाय हैं। राज्य में ‘पाणी अड़वा,पाणी जिरवा’ अभियान के तहत पानी बचाने का सबसे असरदार तरीका वॉटर हार्वेस्टिंग है। इससे ग्राउंडवॉटर लेवल बढ़ता है, कुएं ज़िंदा रहते हैं और खेती के लिए पानी मिलता है। शहरी इलाकों में भी रेनवॉटर हार्वेस्टिंग को ज़रूरी किया जाना चाहिए।
ग्लोबल समाधान: बदलाव की दिशा
पानी की समस्या को हल करने के लिए अलग-अलग लेवल पर कोशिशें चल रही हैं। समुद्री पानी को ताज़े पानी में बदलने (डीसेलिनेशन), गंदे पानी का ट्रीटमेंट और दोबारा इस्तेमाल, और नदी को फिर से ज़िंदा करने के प्रोजेक्ट पर ज़ोर दिया जा रहा है।
केंद्र व राज्य सरकार की कोशिशें
विभागीय सूचना कार्यालय कोल्हापुर के सूचना उपनिदेशक प्रवीण टाके ने जल संकट व समाधान पर उक्त जानकारी उपलब्ध कराते हुए कहा कि भारत एवं महाराष्ट्र सरकार ने पानी के मैनेजमेंट के लिए कई स्कीम लागू की हैं।
इनमें जल जीवन मिशन हर जल जीवन मिशन, अटल भूजल योजना, जल शक्ति अभियान, स्वच्छ भारत मिशन, महाराष्ट्र रूरल वॉटर सप्लाई स्कीम, मुख्यमंत्री जल संधारण योजना, नमामि गंगे योजना आदि केंद्र और राज्य सरकारें कई स्कीम के ज़रिए नागरिकों को पीने का साफ़ पानी उपलब्ध कराने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य कर रही हैं।
18 प्रतिशत आबादी के पास मात्र 4 प्रतिशत जल संसाधन
देश में बढ़ती आबादी के लिए जिस तरह अनाज की मांग भी बढ़ रही है,उसके कारण सिंचाई और पीने के लिए पानी की आवश्यकता में भारी बढ़ोतरी हो रही है। हालांकि, पानी की बढ़ती मांग के बीच एक गंभीर चिंता यह है कि भारत में दुनिया की कुल आबादी का लगभग 18 फीसदी हिस्सा रहता है, जबकि देश के पास केवल 4 फीसदी जल संसाधन ही उपलब्ध हैं।
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