बालासाहेब से कितने अलग हैं उद्धव ठाकरे? कैसे बदली शिवसेना की राजनीति, रिमोट कंट्रोल से MVA सरकार तक की कहानी
Uddhav Thackeray Birthday Special: शिवसेना संस्थापक बालासाहेब ठाकरे के दौर की आक्रामक राजनीति से लेकर उद्धव ठाकरे के 'वर्क फ्रॉम होम' मुख्यमंत्री बनने तक, जानिए उद्धव ने कैसे बदली मातोश्री की राजनीति।
- Written By: आकाश मसने
बालासाहेब ठाकरे के साथ उद्धव ठाकरे (सोर्स: सोशल मीडिया)
Balasaheb To Uddhav Thackeray Political Era: मुंबई का ‘मातोश्री’ बंगला दशकों तक महाराष्ट्र ही नहीं, बल्कि देश की राजनीति का एक ऐसा पावर सेंटर रहा है जहां से निकले एक इशारे पर मुंबई थम जाती थी। शिवसेना संस्थापक बालासाहेब ठाकरे के दौर में मातोश्री की पहचान कड़क आवाज, आक्रामक तेवर और कट्टर हिंदुत्व की राजनीति से थी। लेकिन समय बदला, नेतृत्व बदला और आज उसी मातोश्री का एक बिल्कुल नया दौर देखने को मिल रहा है। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में इस राजनीतिक केंद्र का मिजाज पूरी तरह बदल चुका है।
बालासाहेब ठाकरे के बेटे और शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे का आज यानी 27 जुलाई को जन्मदिन है। उनका जन्म 27 जुलाई 1960 को हुआ था। आइए उनके जन्मदिन पर जानते हैं मातोश्री के नए दौर यानी बालासाहेब ठाकरे के दौर की आक्रामक राजनीति के मुकाबले उद्धव ठाकरे के शांत, संयमित और ‘वर्क फ्रॉम होम’ वाले मुख्यमंत्री के रूप में उनके प्रशासनिक स्टाइल में आए बदलावों की कहानी।
बालासाहेब का दौर: ‘रिमोट कंट्रोल’ और आक्रामक राजनीति
बालासाहेब ठाकरे के समय शिवसेना की राजनीति का मुख्य आधार उनकी बेबाक बयानबाजी, आक्रामक रैलियां और सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन करने वाले शिवसैनिक थे। बालासाहेब ने सरकार में खुद कभी कोई पद नहीं लिया, लेकिन वे सत्ता का ‘रिमोट कंट्रोल’ अपने हाथ में रखते थे। उनके दौर में मातोश्री से जो आदेश निकलता था, वह पत्थर की लकीर होता था। विरोधी भी उनकी इस आक्रामक शैली और जनता पर उनकी मजबूत पकड़ से खौफ खाते थे। तब मातोश्री का मतलब था कट्टरता, क्षेत्रीय अस्मिता और बिना किसी समझौते वाली राजनीति।
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बालासाहेब ठाकरे के साथ उद्धव ठाकरे व राज ठाकरे (सोर्स: सोशल मीडिया)
उद्धव ठाकरे का आगमन: शांत और संयमित बदलाव
शिवसेना प्रमुख बालासाहेब ठाकरे व तत्कालीन शिवसेना नेता राज ठाकरे ने शिवसेना के कार्यकारी अध्यक्ष की कमान उद्धव ठाकरे काे सौंप दी। जब उद्धव ठाकरे ने पार्टी की कमान संभाली, तो कई विश्लेषकों का मानना था कि वह बालासाहेब जैसी आक्रामकता नहीं दिखा पाएंगे। उद्धव स्वभाव से शांत, शालीन और एक प्रोफेशनल वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर रहे हैं।
इसके बाद उद्धव ठाकरे ने मातोश्री के काम करने के तरीके को धीरे-धीरे बदला। उन्होंने राजनीति में आक्रामकता की जगह कॉर्पोरेट स्टाइल, रणनीतिक योजना और संवाद को प्राथमिकता दी। उद्धव ने शिवसैनिकों के जोश को होश के साथ जोड़ने का काम किया, जिससे पार्टी का दायरा शहरी युवाओं और मध्यम वर्ग के बीच और बढ़ा।
मुख्यमंत्री के रूप में ‘वर्क फ्रॉम होम’ और प्रशासनिक स्टाइल
साल 2019 में ठाकरे परिवार के लिए मातोश्री के इतिहास की सबसे बड़ा राजनीतिक मोड़ आया। बालासाहेब की परंपरा से हटकर पहली बार ठाकरे परिवार को कोई सदस्य राजनीतिक पद पर बैठा। बालासाहेब की रिमोट कंट्रोल वाली छवि से हटकर उद्धव ठाकरे ने खुद महाराष्ट्र की सत्ता की कमान संभाली और प्रदेश के मुख्यमंत्री बना। मुख्यमंत्री के रूप में उनका प्रशासनिक स्टाइल बालासाहेब से बिल्कुल अलग था।
महाविकास आघाड़ी के नेताओं के साथ उद्धव ठाकरे (सोर्स: सोशल मीडिया)
कोविड-19 महामारी के दौरान जब पूरी दुनिया संकट में थी, तब उद्धव ठाकरे ने ‘वर्क फ्रॉम होम’ की एक नई कार्यशैली अपनाई। उन्होंने मंत्रालय जाने के बजाय मातोश्री और वर्षा बंगले से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पूरे राज्य का प्रशासन चलाया। उनके धुर विरोधियों ने इस पर तंज कसे और उन्हें ‘फेसबुक लाइव मुख्यमंत्री’ कहा। लेकिन दूसरी तरफ, आम जनता के बीच उनकी इस शैली की भारी तारीफ हुई।
संकट के समय वे हर दूसरे-तीसरे दिन सोशल मीडिया पर लाइव आकर बेहद शांत और धीमे स्वर में जनता से बात करते थे। उन्होंने खुद को ‘महाराष्ट्र का कुटुंब प्रमुख’ (परिवार का मुखिया) घोषित किया। इस संकट प्रबंधन ने उनकी छवि एक आक्रामक नेता की बजाय एक संवेदनशील और भरोसेमंद प्रशासक के रूप में स्थापित की।
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बालासाहेब ने जिसे माना धुर विरोधी, उद्धव ने उन्हीं के साथ संभाली सत्ता की कमान
बालासाहेब ठाकरे के दौर में कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) शिवसेना के धुर विरोधी थे। लेकिन उद्धव ठाकरे ने बदलती राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए वैचारिक लचीलापन दिखाया और महाविकास अघाड़ी (MVA) गठबंधन बनाकर सरकार चलाई। यह कदम बालासाहेब की कट्टर राजनीति से बिल्कुल उलट था। हालांकि, साल 2022 में पार्टी के भीतर हुई बड़ी बगावत के बाद उन्हें सत्ता और पार्टी का नाम-सिंबल गंवाना पड़ा, लेकिन उनके इसी शांत और संयमित व्यवहार ने उन्हें जनता के बीच भारी सहानुभूति दिलाई।
