

Dharashiv Tuljabhavani Temple Gold Melting Proposal Controversy: तुलजाभवानी देवी के चरणों में भक्तों द्वारा अर्पित 247 किलो सोने और 3,298 किलो चांदी को पिघलाने के प्रस्ताव को लेकर विवाद फिर गहरा गया है। मंदिर प्रशासन ने सोना-चांदी पिघलाने के लिए राज्य के विधि एवं न्याय विभाग से नए सिरे से अनुमति मांगी है।
हिंदू जनजागृति समिति ने इसका विरोध करते हुए आरोप लगाया है कि उच्च न्यायालय द्वारा इसी तरह का आवेदन पहले खारिज किए जाने के बावजूद नया प्रस्ताव भेजना अदालत के आदेश की अवमानना है।
समिति की ओर से अधिवक्ता सुरेश कुलकर्णी और अधिवक्ता उमेश भडगांवकर ने धाराशिव के जिलाधिकारी, राज्य के मुख्य सचिव, गृह सचिव तथा विधि एवं न्याय विभाग के सचिव को अवमानना की कानूनी नोटिस भेजी है। समिति ने चेतावनी दी है कि प्रस्ताव वापस नहीं लिया गया तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ व्यक्तिगत रूप से आपराधिक अवमानना याचिका दायर की जाएगी।
यही सवाल अब पूरे विवाद का केंद्र बन गया है। समिति का दावा है कि जिस सोने को पिघलाने की अनुमति मांगी जा रही है, वह न्यायालयीन मामले में शामिल सोने से किस तरह अलग है, इसे प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए।
सर्वोच्च न्यायालय में लंबित मामले और सोना पिघलाने के प्रस्ताव को लेकर भी दोनों पक्षों के दावे अलग हैं। समिति का कहना है कि सर्वोच्च न्यायालय की रोक 8.50 करोड़ रुपये के कथित गबन के मामले में 16 आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई से संबंधित है और इसका सोना पिघलाने की अनुमति से संबंध नहीं है।
अब विधि एवं न्याय विभाग इस नए प्रस्ताव पर क्या फैसला लेता है, इस पर सभी की नजर है। अदालत की अवमानना की चेतावनी और प्रशासन के अवमान नहीं' वाले दावे के बीच तुलजाभवानी मंदिर का 247 किलो सोना एक बार फिर विवाद के केंद्र में आ गया है।
मंदिर प्रशासन ने समिति के आरोपों को खारिज किया है। तुलजाभवानी देवस्थान की प्रबंधक माया माने ने कहा कि आपराधिक मामले में जब्त सोने को छुआ नहीं जाएगा।
न्यायालयीन मामले से अलग सोने-चांदी को पिघलाने के लिए ही सरकार से अनुमति मांगी गई है। इसलिए अदालत की अवमानना का सवाल ही नहीं उठता।
समिति के अनुसार 1 जनवरी 2010 से 10 जून
2023 के बीच भक्तों द्वारा अर्पित किए गए सोने को पिघलाने की अनुमति के लिए मंदिर संस्थान ने उच्च न्यायालय का रुख किया था।
23 जनवरी 2025 को अदालत ने यह आवेदन खारिज कर दिया था। समिति का कहना है कि संबंधित मामला सर्वोच्च न्यायालय में लंबित होने के कारण उच्च न्यायालय ने अंतरिम आदेश में बदलाव करना उचित नहीं माना था।