
पुणे न्यूज (सौ. डिजाइन फोटो )
Pune News In Hindi: पुणे महानगरपालिका चुनाव के नतीजों ने इस बार केवल शहर की सत्ता का समीकरण ही नहीं बदला, बल्कि कई दिग्गज नेताओं की राजनीतिक जमीन भी हिला दी है।
टिकट वितरण में अंदरूनी खींचतान, पार्टी बदलने की राजनीति और वंशवाद के प्रयोगों के बीच आए इन नतीजों ने साफ कर दिया है कि पुणे का मतदाता अब नाम नहीं, काम देख रहा है। कई वार्डों में मुकाबला इतना कड़ा रहा कि हार-जीत के बेहद कम अंतर ने राजनीतिक विश्लेषकों को भी चौंका दिया।
इस चुनाव में कई जगहों पर पार्टी के भीतर असंतोष खुलकर सामने आया। कहीं टिकट को लेकर नाराजगी दिखी, तो कहीं परिवारवाद के चलते उम्मीदवारों को नुकसान उठाना पड़ा। मतदाताओं ने यह संकेत दे दिया कि केवल विरासत या पार्टी का सिंबल अब जीत की गारंटी नहीं है।
चुनाव से ठीक पहले राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुए प्रशांत जगताप इस चुनाव के सबसे अहम टर्निंग पॉइंट साबित हुए। वानवडी–सालुखे विहार क्षेत्र से कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में मैदान में उतरे जगताप ने प्रभावशाली जीत दर्ज की। उन्होंने पूर्व मंत्री बालासाहेब शिवरकर के पुत्र अभिजीत शिवरकर को हराकर यह संदेश दिया कि मतदाता व्यक्ति और उसके काम पर भरोसा कर रहा है, न कि केवल पार्टी पर।
व्यक्ति आधारित राजनीति का एक और उदाहरण सुरेंद्र पठारे की जीत के रूप में सामने आया। शरद पवार गुट के विधायक बापूसाहेब पठारे के पुत्र सुरेंद्र पठारे ने भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ते हुए बड़ी जीत हासिल की। यह परिणाम दर्शाता है कि मतदाताओं ने स्थानीय पकड़, सक्रियता और नेतृत्व क्षमता को प्राथमिकता दी।
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पुणे मनपा चुनाव के नतीजे यह साफ संकेत दे रहे हैं कि शहर की राजनीति अब नए दौर में प्रवेश कर चुकी है। मतदाता प्रदर्शन, विश्वसनीयता और स्थानीय जुड़ाव को महत्व दे रहा है। इन नतीजों के बाद कई दलों को अपनी रणनीति, उम्मीदवार चयन और संगठनात्मक ढांचे पर दोबारा विचार करना पड़ सकता है।






