‘सिर्फ गुजराती-मारवाड़ी ही करें अप्लाई…’ मुंबई में 25 लाख के जॉब ऑफर पर मचा बवाल, भड़के रोहित पवार
Gujarati Marwari Job Controversy: मुंबई में कंपनी द्वारा केवल गुजराती और मारवाड़ी उम्मीदवारों के लिए निकाले गए 25 लाख के जॉब विज्ञापन पर विवाद खड़ा हो गया है। जानें पूरा मामला क्या है?
- Written By: गोरक्ष पोफली
जॉब ऑफर की सांकेतिक फोटो (सोर्स: सोशल मीडिया)
Job Advertisement Gujarati Marwari Candidate Only: मुंबई की समावेशी संस्कृति और रोजगार के अवसरों में समानता को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। हाल ही में नोकरी डॉट कॉम और लिंक्डइन जैसे प्लेटफार्मों पर एक भर्ती विज्ञापन वायरल हुआ, जिसमें मुंबई में रोजगार के लिए केवल गुजराती और मारवाड़ी उम्मीदवारों की शर्त रखी गई थी। इस विज्ञापन ने न केवल मराठी युवाओं में आक्रोश पैदा किया है, बल्कि देश के संविधान द्वारा दिए गए समानता के अधिकार पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मुंबई जैसे महानगर में, जहाँ हर प्रांत के लोग बसते हैं, इस तरह का भाषाई और क्षेत्रीय भेदभाव सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुँचाने वाला माना जा रहा है।
क्या है विवाद की जड़?
यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब अहमदाबाद स्थित एक पोस्टिंग एजेंसी ने मुंबई में EGM और Accounts-Finance जैसे उच्च पदों के लिए विज्ञापन जारी किया। इस नौकरी के लिए सालाना 20 से 25 लाख रुपये का आकर्षक वेतन प्रस्तावित किया गया था। हालांकि, विज्ञापन में पात्रता के तौर पर स्पष्ट रूप से लिखा गया था कि केवल गुजराती और मारवाड़ी समुदाय के लोग ही इसके लिए आवेदन कर सकते हैं।
जैसे ही यह विज्ञापन सोशल मीडिया पर आया, लोगों ने इसे मराठी और अन्य स्थानीय उम्मीदवारों को जानबूझकर दरकिनार करने की साजिश बताया। विवाद बढ़ने पर एजेंसी ने सफाई दी कि कुछ विशेष कार्यों के लिए विशिष्ट भाषा के ज्ञान की आवश्यकता थी, इसलिए क्लाइंट कंपनी की मांग पर ऐसा उल्लेख किया गया और उनका इरादा किसी के खिलाफ भेदभाव करना नहीं था। लेकिन इस स्पष्टीकरण के बावजूद, लोगों ने इसे मुंबई के रोजगार बाजार में बढ़ती संकीर्णता का उदाहरण माना है।
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रोहित पवार की तीखी प्रतिक्रिया
इस मुद्दे पर विपक्षी नेता और विधायक रोहित पवार ने कड़ा विरोध जताया है। रोहित पवार ने कहा कि नौकरी के लिए शैक्षणिक योग्यता, अनुभव और कौशल की शर्तें अनिवार्य होनी चाहिए, लेकिन किसी विशिष्ट समाज को प्राथमिकता देना पूरी तरह से गलत और असंवैधानिक है। उन्होंने तीखे शब्दों में कहा कि मराठी मानुस की मुंबई में ही उन्हें नौकरी से वंचित करने का धृष्टता एक गुजरात स्थित कंपनी ने किया है, जिसका वे कड़ा निषेध करते हैं।
नोकरीसाठी शैक्षणिक पात्रता, कामाचा अनुभव, कौशल्य या अटी असल्याच पाहिजे, परंतु उमेदवार एखाद्या ‘विशिष्ट समाजाचा असल्यास प्राधान्य’ हे मात्र योग्य नाही आणि संविधानाला धरूनही नाही. मराठी माणसाच्या मुंबईतच आज मराठी माणसाला नोकरी नाकारण्याचा आगाऊपणा गुजरातच्या एका कंपनीने केला, त्याचा… pic.twitter.com/aAb7Due03q — Rohit Pawar (@RRPSpeaks) June 10, 2026
पवार ने उल्लेख किया कि महाराष्ट्र में रहने वाले कई गुजराती-मारवाड़ी नागरिक खुद को मराठी होने पर गर्व महसूस करते हैं और वे कभी भेदभाव नहीं करते, लेकिन कुछ विशिष्ट कंपनियों के कारण पूरे समुदाय का नाम बदनाम हो रहा है। उन्होंने सरकार से मांग की है कि ऐसी जातिवादी कंपनी पर तत्काल और कड़ी कार्रवाई की जाए।
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बंटा हुआ समाज और पहचान का संकट
यह विवाद केवल एक व्यावसायिक विज्ञापन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे आधुनिक समाज के भीतर पनप रही विभाजनकारी मानसिकता की ओर इशारा करता है। मुंबई अपनी ‘कोस्मोपॉलिटन’ पहचान और सबको अपनाने के स्वभाव के लिए जानी जाती है, लेकिन जब कॉर्पोरेट जगत में योग्यता के बजाय जाति या भाषा को दीवार बना दिया जाता है, तो यह साझा भाईचारे की जड़ों को कमजोर करता है। जब एक योग्य युवा केवल अपनी भाषाई पहचान के कारण अवसर खो देता है, तो समाज में कड़वाहट और अलगाव का जन्म होता है। एक सशक्त राष्ट्र के निर्माण के लिए यह आवश्यक है कि हम संकीर्ण पहचानों से ऊपर उठकर मेरिट और समानता को प्राथमिकता दें, ताकि विकास की दौड़ में कोई भी खुद को बेगाना न समझे।
