

Maharashtra MSRTC Electric Bus Policy: यूपी में 40 लाख रुपये का अनुदान महाराष्ट्र राज्य मार्ग परिवहन महामंडल के बेड़े को पूरी तरह इलेक्ट्रक बसों में बदलने के लिए राज्य सरकार को उत्तर प्रदेश की तर्ज पर अधिक आकर्षक और व्यावहारिक अनुदान नीति अपनानी होगी। महाराष्ट्र एसटी कर्मचारी कांग्रेस के महासचिव श्रीरंग बरगे ने कहा कि मौजूदा ई-वाहन नीति के तहत ई-बसों के लिए दिया जा रहा अनुदान उनकी वास्तविक लागत की तुलना में बेहद कम है। यदि वर्ष 2047 तक एसटी के बेड़े में शत-प्रतिशत ई-बसें शामिल करने का लक्ष्य हासिल करना है, तो राज्य सरकार को सब्सिडी बढ़ाने के साथ नई प्रोत्साहन नीति लागू करनी होगी।
बरगे का मानना है कि अधिक सरकारी सहायता मिलने से एसटी का आर्थिक बोझ कम होगा, घाटे में कमी आएगी और राज्य में इलेट्रिक बसों की संख्या तेजी से बढ़ सकेगी। राज्य के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की अध्यक्षता में एसटी महामंडल की ई-बसों के संबंध में हुई बैठक के कुछ दिनों बाद बरगे ने अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार की वर्तमान ई-वाहन नीति के तहत सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था में ई-बसों के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए जो प्रोत्साहन दिए जा रहे हैं, उनमें कई कमियां हैं। बरगे ने बताया कि वर्तमान नीति के अनुसार 1,500 ई-बसों के लिए बस की कीमत का 10 प्रतिशत अथवा अधिकतम 20 लाख रुपए तक अनुदान देने का प्रावधान है।
लेकिन ई-बसों की अत्यधिक कीमत को देखते हुए यह सहायता बहुत कम है। यदि अधिक से अधिक ई-बसें सड़कों पर उतारनी हैं, तो सरकार को अतिरिक्त रियायतें और अनुदान उपलब्ध कराना होगा। बरगे ने कहा कि हाल ही में उत्तर प्रदेश सरकार ने इस दिशा में नई नीति अपनाई है, जिसके तहत 9 मीटर लंबी ई-बस के लिए 35 लाख रुपए और 12 मीटर लंबी ई-बस के लिए 40 लाख रुपए तक अनुदान देने का निर्णय लिया गया है।
हाल ही में हुई बेस्ट बस दुर्घटना और मुंबई की सार्वजनिक बस परिवहन व्यवस्था में सुरक्षा संबंधी चिंताओं को लेकर राज्यसभा सांसद मिलिंद देवड़ा ने बेस्ट प्रशासन को पत्र लिखकर वेट-लीज बस संचालन की व्यापक समीक्षा की मांग की है।
बेस्ट समिति की अध्यक्ष तृष्णा विश्वासराव को भेजे गए पत्र में देवड़ा ने बताया कि जनवरी 2023 से दिसंबर 2025 के बीच बेस्ट की 958 बड़ी दुर्घटनाएं दर्ज की गई, जिनमें 77 लोगों की मौत हुई और 217 लोग घायल हुए। पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि इन दुर्घटनाओं में से 85 प्रतिशत से अधिक मामलों में निजी ठेकेदारों द्वारा संचालित वेट-लीज बसें शामिल थीं।