

IIT बॉम्बे के 2026 बैच के सर्वे में 25% विद्यार्थियों ने नकल करने की बता स्वीकार की।
IIT बॉम्बे बैच में 53% से ज्यादा छात्र बड़े शहरों और महानगरों से हैं।
IIT बॉम्बे बैच में ग्रामीण क्षेत्र से केवल 9% छात्र पहुंचे।
ग्रामीण और शहरी परिवारों के कोचिंग खर्च में दोगुने से अधिक का अंतर।
कोचिंग से जेईई की दौड़ पर पड़ रहा सीधा असर।
JEE Main Rural vs Urban Gap: भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) बॉम्बे के 2026 बैच के विद्यार्थियों के एक सर्वे में पढ़ाई, सामाजिक पृष्ठभूमि और परीक्षा में नकल से जुड़े दिलचस्प तथ्य सामने आए हैं। संस्थान की छात्र मीडिया इकाई ‘इनसाइट’ के वार्षिक सीनियर सर्वे के अनुसार, जवाब देने वाले लगभग एक चौथाई विद्यार्थियों ने स्वीकार किया कि उन्होंने मजबूरी में एक या दो बार असाइनमेंट या परीक्षा में नकल की थी।
सर्वे में शामिल अधिकांश विद्यार्थियों ने कहा कि उन्होंने कभी नकल नहीं की। सर्वे के निष्कर्ष ऐसे समय सामने आए हैं, जब आईआईटी बॉम्बे में परीक्षा के दौरान अनुचित साधनों के इस्तेमाल और अनुशासनात्मक कार्रवाई की प्रक्रिया पर चर्चा चल रही है।
IIT बॉम्बे में हुए सर्वे में शामिल विद्यार्थियों में 32.6 प्रतिशत बड़े शहरों और 20.8 प्रतिशत महानगरों से थे। छोटे शहरों और कस्बों से आने वाले विद्यार्थियों की हिस्सेदारी 37.5 प्रतिशत रही, जबकि गांवों से आने वाले केवल 9 प्रतिशत विद्यार्थियों ने सर्वे में भाग लिया। इससे संस्थान के इस बैच में शहरी पृष्ठभूमि वाले विद्यार्थियों की बड़ी हिस्सेदारी का संकेत मिलता है।
हालांकि इस सर्वे की एक अहम समस्या भी है। इसका सैंपल साइज छोटा है। वर्ष 2026 के लगभग 2,400 विद्यार्थियों वाले स्नातक बैच में से सिर्फ करीब 144 विद्यार्थियों ने सवालों के जवाब दिए। इसलिए इसके निष्कर्षों को पूरे बैच की राय नहीं माना जा सकता।
IIT बॉम्बे के सर्वे में करीब एक चौथाई विद्यार्थियों ने कहा कि मौका मिलने पर वे कंप्यूटर साइंस और इंजीनियरिंग शाखा चुनना पसंद करते। वहीं, 32.4 प्रतिशत प्रतिभागियों ने बेहतर प्लेसमेंट अवसरों को शाखा बदलने की संभावित वजह बताया।
85 प्रतिशत से अधिक विद्यार्थियों ने यह भी कहा कि उनके माता-पिता ने विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग, गणित या अन्य क्षेत्रों में स्नातक अथवा स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त की थी। आईआईटी में ग्रामीण भारत की हिस्सेदारी बढ़ी, लेकिन प्रवेश की दौड़ में सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि अब भी अहम है।
आईआईटी तक पहुंच बनाने में केवल प्रतिभा और मेहनत ही नहीं, बल्कि स्कूल की गुणवत्ता, प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी, पारिवारिक शैक्षणिक पृष्ठभूमि और आर्थिक संसाधन भी अहम भूमिका निभाते हैं। ग्रामीण विद्यार्थियों की इंजीनियरिंग शिक्षा तक पहुंच में लंबे समय से असमानता रही है। जेईई में शहरों के विद्यार्थियों की बढ़त है।
शिक्षा मंत्रालय की संयुक्त प्रवेश बोर्ड संबंधी समिति की रिपोर्ट के अनुसार, 2015 में जेईई मेन के लिए आवेदन करने वालों में ग्रामीण क्षेत्रों के उम्मीदवारों की हिस्सेदारी लगभग 45 प्रतिशत थी, लेकिन शीर्ष एक लाख उम्मीदवारों में उनका हिस्सा करीब 30 प्रतिशत था।
सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के 2025 के व्यापक शिक्षा सर्वेक्षण के मुताबिक, देश में 27 प्रतिशत विद्यार्थी निजी कोचिंग ले रहे थे। शहरी क्षेत्रों में यह अनुपात 30.7 प्रतिशत और ग्रामीण क्षेत्रों में 25.5 प्रतिशत था।
शहरी परिवार प्रति विद्यार्थी सालाना औसतन 3,988 रुपये कोचिंग पर खर्च कर रहे थे, जबकि ग्रामीण परिवारों का औसत खर्च 1,793 रुपये था। उच्च माध्यमिक स्तर पर यह अंतर और बढ़ जाता है। ये आंकड़े सभी विद्यार्थियों के हैं, केवल जेईई की तैयारी करने वालों के नहीं।
2015: जेईई मेन के लिए आवेदन करने वालों में ग्रामीण उम्मीदवारों की हिस्सेदारी लगभग 45% थी।
शीर्ष एक लाख में: ग्रामीण उम्मीदवारों का हिस्सा करीब 30% था।
निजी कोचिंग: 2025 के शिक्षा सर्वेक्षण के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में 25.5% और शहरी क्षेत्रों में 30.7% विद्यार्थी निजी कोचिंग ले रहे थे।
कोचिंग पर खर्च: शहरी परिवारों का औसत सालाना खर्च 3,988 रुपये प्रति विद्यार्थी, जबकि ग्रामीण परिवारों का 1,793 रुपये था।
महत्वपूर्ण अंतर: जेईई मेन में आवेदन करने वाले, शीर्ष रैंक पाने वाले और वास्तव में आईआईटी में दाखिला लेने वाले विद्यार्थियों के आंकड़े अलग-अलग हैं।