‘भाषा मां से आती है…न कि जबरदस्ती से’, अभिनेता सयाजी शिंदे की सरकार को दो टूक
महाराष्ट्र में हिंदी भाषा की अनिवार्यता को लेकर हंगामा शुरू है। अभिनेताओं और कवियों ने भी इस नई शिक्षा नीति के खिलाफ मुहीम छेड़ दी है। अभिनेता सयाजी शिंदे ने इसके खिलाफ सरकार से दो टूक की है।
- Written By: प्रिया जैस
सयाजी शिंदे और सीएम देवेंद्र फडणवीस (सौजन्य-सोशल मीडिया)
मुंबई: महाराष्ट्र सरकार ने पहली कक्षा से बच्चों को हिंदी भाषा सीखने को अनिवार्य कर दिया है। पहले सरकार ने हिंदी को अनिवार्य रूप से पढ़ाने का निर्णय लिया था, लेकिन जनता के विरोध के बाद सरकार ने अनिवार्य शब्द हटा दिया। इसी बीच ज्येष्ठ अभिनेता सयाजी शिंदे ने भी सरकार की इस भाषा नीति के खिलाफ अपनी स्पष्ट राय रखी है।
सयाजी शिंदे ने कहा कि भाषा थोपने से कोई भाषा नहीं आती। भाषा तो मां से मिलती है। जबरदस्ती कोई भाषा थोपी जाए, तो उससे कुछ नहीं बदलता। जबरन भाषा बदली भी नहीं जा सकती। इन शब्दों में सयाजी ने हिंदी सीखने की अनिवार्यता पर नाराजगी जताई। बच्चों को मराठी भाषा में पढ़ाइए। यही असली बदलाव लाने का रास्ता है।
मराठी जैसा समृद्ध साहित्य किसी और में नहीं – सयाजी
सयाजी शिंदे ने कहा कि बच्चों पर हिंदी सीखने का दबाव डालना पूरी तरह से गलत है। यह असंवेदनशील और अवैज्ञानिक है। मैं आज जो कुछ भी हूं, वह सिर्फ मेरी मराठी भाषा की वजह से हूं। मेरी मां की, गांव की, तहसील की, जिले की और राज्य की भाषा मराठी है। हमें मराठी में ही पढ़ना चाहिए। छोटे बच्चों को इतनी जल्दी दूसरी भाषाएं सिखाने की क्या जरूरत है? पहले बच्चों को मराठी सही से सीखने दीजिए। मैंने मराठी माध्यम से ही डिग्री तक की पढ़ाई की है। मुझे लगता है कि मराठी जैसा समृद्ध साहित्य किसी और भाषा में नहीं है।
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शिक्षा नीति वापस लेने की अपील
अभिनेता सयाजी शिंदे ने कहा कि मेरी सरकार से विनती है कि आप कुछ भी कीजिए, लेकिन यह नीति वापस लीजिए। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, और हिंदी की अनिवार्यता तय करने वाली समिति में शामिल भाषा-विशेषज्ञों से मेरा विनम्र अनुरोध है – कृपया किसी भी भाषा को थोपिए मत। यह फैसला वापस लीजिए। हमें सरकार को मजबूर करना चाहिए कि वह यह निर्णय वापस ले। हर राज्य को अपनी मातृभाषा को प्राथमिकता देनी चाहिए। महाराष्ट्र में मराठी को सम्मान और महत्व मिलना चाहिए। लेकिन कोई भी भाषा बच्चों पर थोपी नहीं जानी चाहिए।
