वड़ापाव और पकौड़ी अखबार में नहीं होंगे पैक; सिंघम तुकाराम मुंढे की सख्ती, पर आदेश पुराना ही है, जानें सच्चाई

FDA Maharashtra Action: FDA कमिश्नर तुकाराम मुंढे की सख्ती के बाद अखबार में खाना पैक करने पर लगा प्रतिबंध। जानिए क्यों FSSAI का यह पुराना नियम सेहत के लिए है बेहद जरूरी और क्या हैं इसके बड़े नुकसान।
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तुकाराम मुंढ़ें के आदेश की सांकेतिक फोटो (सोर्स: डिजाइन फोटो)
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Tukaram Mundhe Action Food Packaging In Newspaper Ban: महाराष्ट्र के खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) आयुक्त तुकाराम मुंढे वर्तमान में समाचार पत्रों में खाद्य पदार्थों की पैकिंग पर प्रतिबंध को कड़ाई से लागू करने के कारण काफी चर्चा में हैं। वर्धा में गोरस भंडार पर की गई हालिया कार्रवाई के बाद यह मुद्दा विशेष रूप से सुर्खियों में आया है। गोरस भंडार हो या पतंजलि स्टार्स अपनी नो-टॉलरेंस नीति के कारण तुकाराम मुंढे फिलहाल सिंघम रूप में छाए हुए हैं।

नियम की पृष्ठभूमि और वास्तविकता

आम जनता के बीच यह गलतफहमी है कि यह प्रतिबंध स्वयं तुकाराम मुंढे द्वारा बनाया गया एक नया नियम है। हालांकि, यह एक राष्ट्रीय स्तर का कानून है जो पहले से ही अस्तित्व में है। भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने 2016 में ही समाचार पत्रों के उपयोग के खतरों पर एक परामर्श जारी किया था। इसके बाद, खाद्य सुरक्षा और मानक पैकेजिंग 2018 के तहत इसे अपराध घोषित किया गया और यह नियम 1 जुलाई 2019 से पूरे भारत में अनिवार्य रूप से लागू है।

प्रतिबंध के वैज्ञानिक और स्वास्थ्य संबंधी कारण

अखबार के कागज का उपयोग करना स्वास्थ्य के लिए धीमे जहर के समान माना जाता है। इसका प्रमुख कारण हैं हानिकारक स्याही। समाचार पत्र की छपाई में उपयोग होने वाली स्याही में सीसा (Lead), कैडमियम और जिंक जैसी भारी धातुएं होती हैं। जब वड़ा पाव, पकौड़ी या पोहे जैसे गर्म और तैलीय पदार्थ अखबार पर रखे जाते हैं, तो यह स्याही पिघलकर भोजन में मिल जाती है।

इन रसायनों के शरीर में प्रवेश करने से पेट के विकार, लीवर की समस्याएं, किडनी फेल होना और दीर्घकालिक रूप से कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियां हो सकती हैं। अखबार छपाई से लेकर दुकानों तक पहुंचने के दौरान सैकड़ों हाथों और धूल-मिट्टी से गुजरते हैं, जिससे उनमें बैक्टीरिया और वायरस पनपते हैं जो सीधे भोजन को दूषित करते हैं।

तुकाराम मुंढे की भूमिका और कार्रवाई

IAS तुकाराम मुंढे ने इस सुप्त अवस्था में पड़े नियम को जीरो टॉलरेंस की नीति के साथ प्रभावी बनाया। उन्होंने खाद्य सुरक्षा अधिकारियों को निर्देश दिए कि वे सड़क किनारे के विक्रेताओं, मिठाई की दुकानों और होटलों पर छापे मारें। नियमों का उल्लंघन करने वालों पर भारी जुर्माना लगाने और कानूनी कार्रवाई करने की उनकी आक्रामक कार्यशैली के कारण ही आज इस नियम के प्रति व्यापक जन-जागरूकता पैदा हुई है। यह अभियान केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए उठाया गया एक अनिवार्य कदम है।

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