

Chatrapati Shivaji Maharaj Second Rajyabhishek: 6 जून 1674 को रायगढ़ के ऐतिहासिक किले में काशी के विद्वान पंडित गागा भट्ट के मार्गदर्शन में छत्रपति शिवाजी महाराज का प्रथम राज्याभिषेक अत्यंत भव्यता और वैदिक रीति-रिवाज से संपन्न हुआ था। इस ऐतिहासिक अवसर पर पवित्र नदियों के जल से अभिषेक कर शिवाजी महाराज को 'छत्रपति' और 'हैंदव धर्मोद्धारक' की उपाधियां दी गईं।
लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि प्रथम राज्याभिषेक के ठीक 3 महीने बाद, 24 सितंबर 1674 को छत्रपति शिवाजी महाराज का दोबारा राज्याभिषेक कराया गया, जो पूरी तरह से तांत्रिक विधि से संपन्न हुआ था।
इतिहास के पन्नों और 'शिवराज्याभिषेक कल्पतरु' ग्रंथ के अनुसार, प्रथम वैदिक राज्याभिषेक के तुरंत बाद मराठा साम्राज्य में कई दुखद और अवांछित घटनाएं घटने लगीं। राज्याभिषेक के मात्र 12 दिन बाद 18 जून 1674 को राजमाता जिजाबाई का निधन हो गया।
इसके अलावा, सेनापति प्रतापराव गुजर की युद्ध में मृत्यु, रानी काशीबाई का निधन, प्रतापगढ़ किले पर आकाशीय बिजली का गिरना और राज्याभिषेक मंडप में खंभा गिरने से पंडितों के चोटिल होने जैसी दुर्घटनाएं हुईं। इन घटनाओं से तत्कालीन समाज और दरबारियों के बीच भारी संशय और चिंता व्याप्त हो गई।
इन परिस्थितियों के बीच तांत्रिक परंपरा के प्रसिद्ध साधक निश्चलपुरी गोसावी ने शिवाजी महाराज से भेंट की। उन्होंने दावा किया कि गागा भट्ट द्वारा आयोजित वैदिक राज्य अभिषेक में कुछ खगोलीय त्रुटियां थीं और उस दौरान स्थानीय कुलदेवताओं, भैरव, वेताल और स्थानीय शक्तियों के तांत्रिक पूजन की उपेक्षा की गई थी।
निश्चलपुरी का तर्क था कि वैदिक अनुष्ठान में तांत्रिक परंपरा का मान न रखने के कारण ही ये अपशकुन हुए।
छत्रपति शिवाजी महाराज एक अत्यंत व्यावहारिक और प्रजा-हितैषी शासक थे। वे अपनी प्रजा और राज्य के सभी वर्गों के मन से भय व आशंकाओं को पूरी तरह समाप्त करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने तांत्रिक परंपरा का आदर करते हुए दूसरा राज्याभिषेक कराने की सहमति दी।
आनंद नाम संवत्सर, आश्विन शुद्ध पंचमी (24 सितंबर 1674) को रायगढ़ में निश्चलपुरी गोसावी के सानिध्य में यह द्वितीय राज्याभिषेक संपन्न हुआ। इसमें मंत्रोच्चार, कलश स्थापना, शस्त्र पूजन और सिंहासन की तांत्रिक शुद्धि जैसी विशेष विधियां की गईं।
प्रथम राज्याभिषेक की तुलना में यह दूसरा समारोह अत्यंत सादगी भरा था, जिसका उल्लेख फारसी तवारिखों या विदेशी यात्रियों के विवरणों में कम ही मिलता है। हालांकि, छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा सभी धार्मिक पंथों व परंपराओं को सम्मान देने का यह कदम उनकी महान दूरदर्शिता और सर्वसमावेशी सोच को दर्शाता है।