जबरन शादी से बचने के लिए छोड़ा था घर; अब बॉम्बे हाईकोर्ट ने महिला के हक में सुनाया यह बड़ा फैसला
Bombay High Court Judgment: जबरन शादी के खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला। कोर्ट ने बालिग महिला की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सर्वोपरि मानते हुए दी बड़ी राहत। पूरी कानूनी खबर यहाँ पढ़ें।
- Written By: गोरक्ष पोफली
बॉम्बे हाईकोर्ट (सोर्स: सोशल मीडिया)
Bombay HC Verdict Adult Woman Personal Liberty: बॉम्बे हाईकोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण मामले में 21 वर्षीय बालिग महिला के पक्ष में फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि एक बालिग महिला अपनी मर्ज़ी से यह तय करने में कानूनी तौर पर पूरी तरह सक्षम है कि वह कहां रहना चाहती है और किससे शादी करना चाहती है। न्यायालय ने इस बात पर कड़ा ज़ोर दिया कि न तो महिला के माता-पिता और न ही राज्य उसे उसकी इच्छा के विरुद्ध कोई भी फैसला लेने के लिए मजबूर कर सकते हैं।
यह मामला एक युवा मुस्लिम महिला से जुड़ा है जो मूल रूप से हैदराबाद की रहने वाली थी। याचिकाकर्ता महिला ने कोर्ट को बताया कि जब वह मात्र 2 महीने की थी, तब उसके असली माता-पिता ने उसे उसके मामा-मामी को गोद दे दिया था। महिला का आरोप था कि उसके ये माता-पिता उसे नियंत्रित करने की कोशिश कर रहे थे और उसकी इच्छा के विरुद्ध उसकी शादी उसके चचेरे भाई से करना चाहते थे, जो उम्र में उससे 10 साल बड़ा है।
हैदराबाद से मुंबई तक का सफर और पुलिस से संपर्क
अपनी मर्ज़ी के खिलाफ होने वाली इस शादी से बचने के लिए महिला ने 15 जून को हैदराबाद स्थित अपना घर छोड़ दिया। वह वहां से फ्लाइट पकड़कर कोल्हापुर पहुंची और फिर वहां से बस के ज़रिए मुंबई आई। मुंबई पहुंचने के बाद वह सीधे पवई पुलिस स्टेशन गई और पुलिस को सूचित किया कि उसने अपनी मर्ज़ी से घर छोड़ा है। उसने पुलिस से अनुरोध किया कि यदि उसके पालक माता-पिता उसके खिलाफ कोई गुमशुदा व्यक्ति की शिकायत दर्ज कराते हैं, तो उस पर कोई कार्रवाई न की जाए।
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हाईकोर्ट की बेंच और वरिष्ठ वकीलों की दलीलें
महिला ने सीनियर वकील मिहिर देसाई और वकील देवयानी कुलकर्णी के माध्यम से एक्टिंग चीफ जस्टिस रवींद्र घुगे और जस्टिस गौतम अंखाड की डिवीजन बेंच के समक्ष याचिका दायर की। याचिका में उसने मांग की कि उसे उसके माता-पिता के पास वापस लौटने या जबरन शादी करने के लिए मजबूर न किया जाए।
न्यायालय की महत्वपूर्ण टिप्पणियां और आदेश
जजों ने मामले की गंभीरता को देखते हुए महिला और उसके माता-पिता दोनों से विस्तार से बातचीत की। कोर्ट इस बात से पूरी तरह संतुष्ट था कि महिला अपनी स्वतंत्र इच्छा से काम कर रही है। जजों ने अपने आदेश में कहा कि वह 21 साल की बालिग है और कानूनी तौर पर यह तय करने में सक्षम है कि वह कहां रहना चाहती है, किससे शादी करना चाहती है या आगे क्या पढ़ना चाहती है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ये निजी पसंद के मामले हैं और भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकारों का हिस्सा हैं। कोर्ट ने माना कि भले ही माता-पिता ने हलफनामे में वादे किए हों, लेकिन वे याचिकाकर्ता की अपनी पसंद से ऊपर नहीं हो सकते।
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पुलिस को सख्त निर्देश
बॉम्बे हाईकोर्ट ने मुंबई और तेलंगाना पुलिस को कड़े निर्देश जारी किए हैं। कोर्ट ने कहा कि महिला को गुमशुदा व्यक्ति मानने या उसे जबरन वापस लाने की किसी भी प्रक्रिया का कोई औचित्य नहीं है। न्यायालय ने तेलंगाना पुलिस को निर्देश दिया कि वह महिला के माता-पिता द्वारा दर्ज कराई गई मीसिंग रिपोर्ट को बंद करने के लिए उचित कदम उठाए। इसके अलावा, यह भी आदेश दिया गया कि महिला को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से घर लौटने के लिए मजबूर न किया जाए और न ही किसी आपराधिक कार्यवाही के ज़रिए उस पर दबाव बनाया जाए।
इस फैसले के साथ न्यायालय ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और बालिग नागरिकों के अधिकारों के संरक्षण की दिशा में एक बड़ी नज़ीर पेश की है।
