

Students Fail Marathi SSC: महाराष्ट्र में मराठी भाषा को लेकर चल रही राजनीति के बीच दसवीं के परीक्षा परिणामों ने एक कड़वी सच्चाई पेश की है। सरकार एक ओर गैर-मराठी रिक्शा चालकों के लाइसेंस रद्द करने की धमकी देकर उन्हें मराठी सीखने पर विवश कर रही है, तो दूसरी ओर राज्य की शैक्षणिक व्यवस्था अपने ही बच्चों को मातृभाषा में पास कराने में विफल साबित हो रही है। इस वर्ष के परिणाम दर्शाते हैं कि मराठी को बचाने का संघर्ष अब केवल बाहरी लोगों से नहीं, बल्कि घर के भीतर बढ़ती भाषाई उदासीनता से भी है।
आंकड़ों के अनुसार, 10,87,699 छात्रों ने मराठी को अपनी पहली भाषा के रूप में चुना था, जिनमें से लगभग 92.57% ही सफल हुए। इसका सीधा अर्थ है कि हजारों बच्चे उस भाषा में भी परीक्षा पास नहीं कर सके, जिसमें वे सोचते, सपने देखते और घर में बात करते हैं। यह भाषाई संकट आने वाले समय में मराठी के 'विलुप्त होने' के खतरे की ओर इशारा करता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि स्कूलों में मराठी पढ़ाने की गुणवत्ता में भारी गिरावट आई है। आज ऐसे शिक्षकों की कमी है जो पाठ्यपुस्तकों के बाहर जाकर छात्रों में भाषा के प्रति प्रेम जगा सकें। व्याकरण के नियमों (जैसे कर्ता-कर्म-क्रिया) के प्रति शिक्षकों की अनभिज्ञता छात्रों में भी स्थानांतरित हो रही है। इसके साथ ही, पाठ्यपुस्तकों की सामग्री का स्तर भी गिरा है, जो अब छात्रों को भाषाई रूप से समृद्ध करने के बजाय केवल एक औपचारिक कार्य बनकर रह गया है।
आज की पीढ़ी बर्गर, पिज्जा और नूडल्स की संस्कृति के साथ-साथ डिजिटल संवाद की ओर बढ़ चुकी है। मोबाइल पर टाइप की जाने वाली 'मिश्रित अंग्रेजी' और सोशल मीडिया की संक्षिप्त भाषा ने मानक मराठी के व्याकरण को गौण कर दिया है। शहरी परिवेश में पले-बढ़े माता-पिता का अपने बच्चों से घर पर मराठी के बजाय अन्य भाषाओं में बात करना भी इस गिरावट का एक बड़ा कारण है।
मराठी भाषा के संरक्षण के लिए किए जा रहे सरकारी प्रयास वर्तमान में दिशाहीन नजर आ रहे हैं। भाषा को रोजगार और ज्ञान सृजन से जोड़ने में सरकार बहुत पीछे रह गई है। केवल आदेश जारी करने और दूसरों को भाषा सीखने के लिए विवश करने से मराठी समृद्ध नहीं होगी। यदि सरकार ने शिक्षा की गुणवत्ता और नई पीढ़ी के जुड़ाव पर काम नहीं किया, तो यह परिणाम केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि मराठी भाषा के पतन की शुरुआत साबित हो सकते हैं।