पुण्यतिथि विशेष: स्वराज का शंखनाद करने वाले लोकमान्य तिलक के 8 महा-योगदान, जिन्होंने बदल दी देश की तकदीर
Bal Gangadhar Tilak Contributions: लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की पुण्यतिथि पर विशेष खबर। जानिए स्वराज, स्वदेशी, केसरी पत्रिका से लेकर उनके वे 8 महा-योगदान जिन्होंने देश की तकदीर बदल दी।
- Written By: गोरक्ष पोफली
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की पुण्यतिथि (सोर्स: एआई फोटो)
Lokmanya Bal Gangadhar Tilak Death Anniversary: ब्रिटिश लेखक वैलेंटाइन शिरोल ने तिलक को भारतीय अशांति का जनक कहा था, जो वास्तव में उनके द्वारा पैदा की गई राष्ट्रभक्ति की लहर का प्रमाण था। उनकी पुण्यतिथि पर देश उन्हें एक ऐसे नायक के रूप में याद करता है जिसने लोकमान्य की उपाधि अपने कार्यों से अर्जित की थी।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक एक ऐसे दैदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिन्होंने भारतीय जनमानस को गुलामी की जंजीरें तोड़ने के लिए न केवल प्रेरित किया, बल्कि उनमें आत्मविश्वास का संचार भी किया। आज उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर, हम उनके उन आठ प्रमुख योगदानों का स्मरण कर रहे हैं, जिनके कारण वे युगों-युगों तक भारतीय समाज के हृदय में जीवित रहेंगे।
स्वराज का शंखनाद
तिलक पहले ऐसे नेता थे जिन्होंने पूर्ण स्वराज की मांग को जन-आंदोलन बनाया। उनका यह अमर नारा स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा देश के कोने-कोने में गूँज उठा और इसने भारतीयों के भीतर सोए हुए राष्ट्रवाद को जगा दिया।
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सार्वजनिक गणेश उत्सव की शुरुआत
समाज को जातियों के बंधन से ऊपर उठाकर एकजुट करने के लिए तिलक ने 1893 में भगवान गणेश की निजी पूजा को एक भव्य सार्वजनिक उत्सव में बदल दिया। इस माध्यम से उन्होंने लोगों को एकत्र होने और राजनीतिक चर्चा करने का एक सुरक्षित मंच प्रदान किया।
शिवाजी उत्सव के जरिए राष्ट्रीय गौरव
1895 में उन्होंने छत्रपति शिवाजी महाराज के सम्मान में उत्सव की शुरुआत की। इसका मुख्य उद्देश्य युवाओं में साहस पैदा करना और उन्हें भारत के गौरवशाली इतिहास की याद दिलाकर स्वाभिमान के साथ जीने की प्रेरणा देना था।
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की पुण्यतिथि (सोर्स: एआई फोटो)
शिक्षा के माध्यम से राष्ट्रवाद
तिलक का मानना था कि गुलामी से मुक्ति का रास्ता शिक्षा से होकर गुजरता है। उन्होंने डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी और फर्ग्यूसन कॉलेज की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, ताकि भारतीयों को ऐसी शिक्षा मिल सके जो उनमें देशभक्ति की भावना भरे।
निर्भीक पत्रकारिता- केसरी और द मराठा
उन्होंने मराठी में केसरी और अंग्रेजी में ‘द मराठा’ अखबारों के जरिए ब्रिटिश हुकूमत की चूलें हिला दीं। जेल जाने के डर के बिना उन्होंने लेख लिखे और जनता को राजनीतिक रूप से जागरूक किया।
स्वदेशी का प्रचार
आत्मनिर्भर भारत की नींव उन्होंने बहुत पहले ही रख दी थी। तिलक ने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग पर जोर दिया। इसी कड़ी में उन्होंने बॉम्बे स्वदेशी स्टोर्स की स्थापना में भी मदद की।
गीता रहस्य और कर्म योग
मांडले जेल की लंबी कैद के दौरान उन्होंने गीता रहस्य जैसा कालजयी ग्रंथ लिखा। इसमें उन्होंने भगवद गीता की व्याख्या करते हुए ‘कर्म योग’ पर जोर दिया, जिससे संघर्षरत भारतीयों को कर्म करने की नई दिशा मिली।
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हिंदू-मुस्लिम एकता और लखनऊ समझौता
तिलक एक दूरदर्शी राजनेता थे। उन्होंने 1916 में मोहम्मद अली जिन्ना के साथ मिलकर लखनऊ समझौता (Lucknow Pact) करने में अहम भूमिका निभाई, ताकि ब्रिटिश सरकार के खिलाफ हिंदू और मुस्लिम एक साथ मिलकर आवाज उठा सकें।
लोकमान्य तिलक का जीवन हमें सिखाता है कि अडिग संकल्प और निस्वार्थ सेवा से किसी भी साम्राज्य को झुकाया जा सकता है। आज के भारत में उनकी प्रासंगिकता और भी बढ़ गई है।
