जालना में मौसम का डबल अटैक: 14 वर्षों में 5 बार सूखा और 8 बार अतिवृष्टि, एल नीनो ने बढ़ाई किसानों की धड़कन
Jalna Drought History: जालना में जलवायु परिवर्तन का कहर, 14 साल में 5 बार सूखा और 8 बार अतिवृष्टि। एल नीनो के खतरे के बीच खरीफ सीजन पर संकट। जानें जिले के बदलते मौसम की पूरी रिपोर्ट।
- Written By: गोरक्ष पोफली
सांकेतिक फोटो (सोर्स: सोशल मीडिया)
Jalna Climate Change: जालना जिले में मौसम का बदलता मिजाज और जलवायु की अनिश्चितता यहाँ के किसानों के लिए एक स्थायी चिंता का विषय बन गई है। पिछले 14 वर्षों के आंकड़ों का विश्लेषण करें तो यह स्पष्ट होता है कि जिला प्रकृति के दो चरमों के बीच झूल रहा है; इस दौरान जिले ने 5 बार भीषण सूखे और 8 बार विनाशकारी अतिवृष्टि का सामना किया है। मौसम वैज्ञानिकों द्वारा अब ‘एल नीनो’ (El Nino) के प्रभाव में वृद्धि की आशंका जताए जाने के बाद, खरीफ सीजन की सफलता को लेकर किसान एक बार फिर गहरे तनाव में हैं।
सूखे का लंबा दौर और जल संकट
जालना लंबे समय से सूखा प्रभावित क्षेत्र रहा है। वर्ष 2012 का सूखा विशेष रूप से भयावह था, जब सामान्य वर्षा की तुलना में केवल 44 प्रतिशत बारिश हुई थी। उस समय न केवल फसलों को भारी आर्थिक चपत लगी, बल्कि पेयजल और पशुओं के चारे की भी गंभीर समस्या पैदा हो गई थी। इसके बाद भी संकट थमा नहीं; वर्ष 2014 (54%), 2015 (66%), 2018 (61%) और हाल ही में वर्ष 2023 (73%) में मानसून कमजोर रहने से जिले को बार-बार सूखे जैसी स्थितियों का सामना करना पड़ा है।
अतिवृष्टि और खेतों में जलभराव
सूखे के विपरीत, अतिवृष्टि ने भी किसानों को कम नुकसान नहीं पहुँचाया है। वर्ष 2020 से 2022 तक के तीन साल अत्यधिक वर्षा के रहे, जहाँ वर्षा का आंकड़ा क्रमशः 157%, 183% और 143% तक पहुँच गया। भारी बारिश के कारण खेतों में जलभराव हो गया, जिससे खरीफ की फसलें पूरी तरह बर्बाद हो गईं। हालांकि 2024 और 2025 में वर्षा संतोषजनक रही, लेकिन 2025 के दौरान घनसावंगी, अंबड, मंठा और जालना तहसील में अतिवृष्टि ने फसलों को काफी क्षति पहुँचाई।
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भविष्य की तैयारी और जागरूकता
वर्तमान में, एल नीनो के संभावित खतरे को देखते हुए कृषि विभाग ने कमर कस ली है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मानसून सामान्य से कम रहता है, तो खरीफ की बुआई में देरी हो सकती है, जिसका सीधा असर उत्पादन पर पड़ेगा। इस स्थिति से निपटने के लिए किसानों को कम पानी वाली फसलों, जल संरक्षण तकनीकों और वैकल्पिक कृषि पद्धतियों को अपनाने के लिए जागरूक किया जा रहा है। प्रशासन अब किसानों को मौसम आधारित कृषि योजना बनाने की सलाह दे रहा है ताकि वे आने वाली चुनौतियों का डटकर सामना कर सकें।
