ठंडी रातों वाला नासिक अब आग उगल रहा, 42°C पार तापमान, पेड़ों की कटाई से बढ़ी गर्मी; उठे पर्यावरण पर सवाल
Nashik Tree Cutting Effects: नासिक में तापमान 42°C पार, रात में भी राहत नहीं। पेड़ों की कटाई और तेजी से बढ़ते शहरीकरण ने शहर की ठंडी पहचान को भीषण गर्मी में बदल दिया।
- Written By: अंकिता पटेल
नासिक गर्मी, तापमान वृद्धि, (प्रतीकात्मक तस्वीर सोर्स: सोशल मीडिया)
Nashik Heatwave News: एक समय में अपनी ठंडी ओस वाली रातों के लिए मशहूर नासिक शहर आज आग उगल रहा है। दिन की बात तो दूर है यहां रात में भी गर्मी से राहत नहीं मिल रही है। पिछले कुछ समय से नासिक में तापमान का पारा 42 डिग्री सेंटीग्रेड के पार पहुंच चुका है, इस बार की गर्मी ने पिछले कई दशकों के रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। शहर में बढ़ते ताममान की सबसे बड़ी वजह शहर में बन रही इमारतें तथा पौधारोपण की कमी माना जा रहा है।
बढ़ते शहरी करण की वजह से शहर से हवा देने वाले वृक्ष लगातार कम होते जा रहे हैं, शहर के विकास का नाम देकर पेड़ों की कटाई की जा रही है आसपास के जंगलों को नष्ट करने का काम किया जा रहा है, हालांकि सरकार के इस विकास का विरोध जोर शोर से किया जा रहा है लेकिन विकास के आगे यह विरोध बौना साबित हो रहा है।
एक समय पर्यटकों की पहली पसंद था नासिक जो शहर कभी अपनी सुहावनी आबोहवा के लिए पर्यटकों की पहली पसंद हुआ करता था, वह अब भीषण गर्मी और तपती हवाओं के चंगुल में फंस गया है।
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स्मार्ट सिटी’ और विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच, नासिक के आम नागरिकों के मन में कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। विकास के नाम पर
पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह से हजारों पेड़ों की कटाई की गई, उसका सीधा असर अब पर्यावरण पर दिखने लगा है। सड़कों के चौड़ीकरण और ऊंची इमारतों के निर्माण ने शहर के फेफड़ों को छलनी कर दिया है।
यही हाल रहा तो सबसे गर्म शहर बन कर रह जाएगा
- एक दौर था जब नासिक को हरा भरा शहर के रुप में जाना जाता था लेकिन बढ़ते कंक्रीटीकरण ने इसे कंक्रीट के जंगल के रूप में परिवर्तित कर दिया है।
- बुनियादी ढांचे के नाम पर पुराने वटवृक्षों और धनी हरियाली को बलि चढ़ा दिया गया।
- मिट्टी की जगह अब हर तरफ सीमेंट और हामर है, जो गमों को सौखकर रात के समय भी वातावरण को ठंडा नहीं होने देते।
- शहर के भीतर के बगीचे और वन क्षेत्र सिकुड़ते जा रहे हैं। यह केवल मौसम का बदलाव नहीं है, बल्कि हमारे पर्यावरण के साथ की गई छेड़छाड़ का नजा है।
- अगर अब भी हम नहीं संभाले तो आने वाली पीढ़ियों के लिए नासिक में सांस लेना भी दूभर हो जाएगा
हम विकास के विरोधी नहीं है, लेकिन यह पर्यावरण की कीमत पर नहीं होना बाहिए, नदियों और सड़कों का अंधाधुंध कांक्रीटीकरण और प्राचीन वृक्षों की कटाई प्रशासन के शून्य नियोजन को दर्शाती है, विकास के नाम पर प्राकृतिक संपदा का विनाश बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।
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-निशिकांत पगारे, पर्यावरण ऐनी, नासिक
सिंहस्थ के नाम पर पेड़ों की कटाई और नदी के प्राकृतिक स्वरूप से छेड़छाड व्यर्यावरण के लिए घातक है। प्रशासन ‘ऑक्सीजन पार्क’ बनाने के बजाय कंक्रीट के निर्माण को प्राथमिकता दे रहा है, जो उनके शून्य नियोजन और जलवायु परिवर्तन के प्रति लापरवाही को दर्शाता है।
-योगेषा बर्वे, पर्यावरण प्रेमी, नासिक।
-नवभारत लाइव के लिए नागपुर से संतोष भारस्कर की रिपोर्ट
