बैलों की घंटियां, मिट्टी के नंदी और बचपन की यादें, गोंदिया में आज भी जिंदा है पोला की वही यादें

Gondia Pola Festival Memories: ट्रैक्टरों के दौर में भी गोंदिया जिले में पोला पर्व की यादें और परंपराएं जीवंत हैं; मिट्टी के नंदी बैलों और सजाए गए बैलों के साथ आज भी मनाया जाता है यह पर्व।
Gondia Pola Festival Memories
गोंदिया में पोला पर्व पर सजाए गए बैल(सोर्स: सोशल मीडिया)
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Maharashtra Rural Culture Pola Traditions: गोंदिया की गलियों में पोला आते ही कभी एक अलग ही रौनक दिखाई देती थी। पर्व आने से कई दिन पहले ही गांवों और मोहल्लों में तैयारियां शुरू हो जाती थीं। किसान अपने उन बैलों को सजाने की तैयारी करते थे, जो पूरे साल खेतों में उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करते थे।

पोला के दिन बैलों को नहलाया जाता, उन्हें सजाया जाता और विशेष रूप से तैयार कर पूजा की जाती। उस दिन बैलों को खेती के काम से पूरी तरह आराम दिया जाता था। यह केवल एक रस्म नहीं, बल्कि किसान और उसके पशुधन के बीच वर्षों पुराने आत्मीय रिश्ते को सम्मान देने का अवसर था।

मिट्टी के नंदी बैलों का था अलग आकर्षण

पोला का उत्साह सिर्फ किसानों तक सीमित नहीं रहता था। बच्चों के लिए भी यह पर्व किसी त्योहार से कम नहीं था। पुराने समय में मिट्टी और लकड़ी से बने नंदी बैल और अन्य पारंपरिक खिलौने बाजारों में आकर्षण का केंद्र होते थे।

बच्चे अपनी पसंद के खिलौने खरीदकर समूह में मोहल्लों और गलियों में घूमते थे। बाजारों में सजावटी वस्तुओं और खिलौनों की दुकानों पर भीड़ उमड़ती थी।

कुडवा के सरपंच बालकृष्ण पटले कहते हैं कि पहले पोला का इंतजार पूरे साल रहता था। बैलों को सजाने और बच्चों के लिए मिट्टी के नंदी बैल खरीदने को लेकर हर घर में अलग उत्साह होता था। आज भी पोला आते ही बचपन की वही यादें ताजा हो जाती हैं।

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ट्रैक्टर आए, लेकिन परंपरा नहीं गई

समय के साथ खेती का स्वरूप तेजी से बदला। ट्रैक्टर और आधुनिक कृषि उपकरणों के बढ़ते इस्तेमाल से खेतों में बैलों की भूमिका पहले जैसी नहीं रही। दूसरी ओर, बच्चों के पारंपरिक खिलौनों की जगह आधुनिक खिलौनों, मोबाइल और डिजिटल मनोरंजन ने ले ली।

इसके बावजूद पोला की सांस्कृतिक पहचान कमजोर नहीं हुई। ग्रामीण क्षेत्रों के साथ शहरों में भी लोग इसे अपनी कृषि संस्कृति और लोकपरंपरा से जोड़कर देखते हैं।

नई पीढ़ी तक पहुंच रही पुरानी विरासत

अंशुल बिसेन के अनुसार, बदलते दौर में भी पोला गोंदिया जिले की कृषि संस्कृति, लोकपरंपराओं और पुरानी पीढ़ी की यादों को नई पीढ़ी से जोड़ने का काम कर रहा है। विजय अग्रवाल बताते हैं कि उनके बचपन में पोला के दिन मोहल्लों और बाजारों में अलग ही रौनक रहती थी और मिट्टी के खिलौनों का विशेष आकर्षण होता था।

राजेंद्र गुप्ता के अनुसार, पोला केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि किसान और पशुधन के बीच वर्षों पुराने संबंध का प्रतीक है। आधुनिक खेती के दौर में इस परंपरा का संरक्षण जरूरी है।

यही वजह है कि बैलों की भूमिका भले कम हुई हो, लेकिन पोला की घंटियों में आज भी गोंदिया की कृषि संस्कृति और बीते बचपन की आवाज सुनाई देती है।

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