टिकट न मिलने से उम्मीदवारों में नाराज़गी, कार्यकर्ताओं में असमंजस, चुनावी माहौल में घमासान

Gondia Election Ticket Dispute: गोंदिया चुनाव में टिकट न मिलने से उम्मीदवारों में नाराज़गी और कार्यकर्ताओं में असमंजस बढ़ा। कई दावेदारों ने निर्दलीय नामांकन दाखिल कर पार्टी को चुनौती दी।
टिकट न मिलने से उम्मीदवारों में नाराज़गी
टिकट न मिलने से उम्मीदवारों में नाराज़गी (सौजन्यः सोशल मीडिया)
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Gondia News: कई उम्मीदवारों ने ‘टिकट मिलने’ के भरोसे चुनावी तैयारियाँ जोर-शोर से की थीं। लेकिन अंतिम समय में टिकट नहीं मिलने पर कुछ उम्मीदवारों ने दूसरे दलों के समर्थन से नामांकन दाखिल कर दिया, जबकि कुछ ने सीधे तौर पर निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में उतरकर पार्टी को चुनौती दी है। इस बीच, नाराज़ नेताओं को मनाने के प्रयास लगातार जारी हैं।

कई दावेदारों ने इस उम्मीद में वार्ड में बड़ी संख्या में समर्थक उतारे थे कि उन्हें टिकट मिलेगा, लेकिन अंतिम क्षणों में नाम काटे जाने से वे हताश और क्रोधित हैं। हाल ही में पार्टी द्वारा दूसरे दलों के नेताओं, पदाधिकारियों और सक्रिय कार्यकर्ताओं को शामिल किया गया है, जिससे पुराने कार्यकर्ताओं में भ्रम की स्थिति पैदा हो गई है। कल तक विपक्षी दल का चेहरा रहे नेताओं के हाथ में बदला हुआ चुनाव चिन्ह देखकर आम मतदाता भी असमंजस में हैं।

खुलकर जताया विरोध

उधर, कुछ स्थानीय उम्मीदवार जिन्हें टिकट मिलने का पूरा विश्वास था, लेकिन अंतिम समय में बाहर कर दिया गया, उन्होंने खुलकर विरोध जताया है। वहीं कुछ ने नाराज़गी मन में दबाकर चुपचाप बैठने में ही भलाई समझी। दूसरी पार्टियों से नेताओं को टिकट देने के बाद अन्य दलों ने भी यही रणनीति अपनाते हुए नए चेहरों को अपने पाले में खींचकर अपनी स्थिति मजबूत की है।

क्या नाराज़ कार्यकर्ता पार्टी के लिए काम करेंगे?

टिकट न मिलने से कई कार्यकर्ता असंतुष्ट हैं। कुछ ने पार्टी छोड़कर निर्दलीय या विरोधी दल का दामन थाम लिया है। नाराज़ कार्यकर्ताओं का यह समूह पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवारों के वोट प्रतिशत को प्रभावित कर सकता है। ऐसी आशंका जताई जा रही है।

प्रतिक्रियाएं

सामाजिक कार्यकर्ता गणेश राधेश्याम अग्रवाल ने कहा कि “टिकट बंटवारे में निश्चित रूप से गलती हुई है, लेकिन हर दल का हाईकमान अपनी रणनीति के अनुसार निर्णय लेता है। पार्टी के भीतर बगावत के सुर सुनाई दे रहे हैं। कुछ लोग टिकट वितरण से बेहद असंतुष्ट हैं और कुछ ने अपनी नाराज़गी दबाकर चुप रहना ही उचित समझा है।”

विजय अग्रवाल ने कहा कि“रूठने वालों को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है। लगभग 88 लोगों ने नगराध्यक्ष पद के लिए टिकट मांगा था। अगर यह पद ओबीसी के बदले जनरल होता, तो यह संख्या 134 पार कर जाती। एक सीट के लिए इतनी बड़ी संख्या में दावेदार होंगे तो एक को छोड़कर बाकी सभी अलग-अलग स्तर पर नाराज़ तो होंगे ही। कोई भी पार्टी अपने लोगों को खोना नहीं चाहती, लेकिन यह स्थिति अनिवार्य है।”

गणेश नगर के विक्की गंबानी ने कहा कि “मनमुटाव स्थायी नहीं होते। बड़ी पार्टी की प्रतिष्ठा, विरासत और विचारधारा को देखकर यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि जो आज अलग हुए हैं वे हमेशा दूर रहेंगे। चुनाव आते-जाते रहते हैं, परंतु रिश्ते और विचारधाराएँ अधिक समय तक अलग नहीं रहतीं। आज नहीं तो कल हम फिर सभी को साथ देखेंगे।”

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