गोंदिया में सारस संरक्षण और विषमुक्त खेती पर कार्यशाला, किसानों को दिया गया विशेष मार्गदर्शन
Sarus Conservation: गोंदिया में जिला अधीक्षक कृषि अधिकारी और सेवा संस्था के संयुक्त तत्वावधान में सारस संरक्षण एवं विषमुक्त खेती पर एक दिवसीय कार्यशाला आयोजित की गई।
Sarus Conservation (सोर्सः फाइल फोटो-सोशल मीडिया)
Gondia Organic Farming: गोंदिया जिला अधीक्षक कृषि अधिकारी व सेवा संस्था के संयुक्त तत्वावधान में नए डीपीसी सभागृह जिलाधीश कार्यालय में सारस संरक्षण व जहर मुक्त खेती पर एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला में कृषि आदान विक्रेताओं, किसानों, कृषि अधिकारियों व कर्मचारियों, कृषि मित्रों, स्वयंसेवक सरस मित्रों ने भाग लिया।
जिले में सारस की वर्तमान स्थिति, उनके आवासों का संरक्षण, प्रजनन क्षेत्रों का संरक्षण और गैर विषैले और जैवविविधता के अनुकूल खेती के तरीकों का प्रसार कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य था। इस अवसर पर इस बात पर प्रकाश डाला गया कि सारस के प्राकृतिक आवास को संरक्षित करने के लिए स्थानीय किसानों, ग्रामीणों और समुदाय की सक्रिय भागीदारी बहुत महत्वपूर्ण है।
कृषि पर हुई महत्वपूर्ण कार्यशाला
कार्यक्रम में सेवा संस्था के अध्यक्ष सावन बहेकार ने सारस की वर्तमान स्थिति, गोंदिया जिले में आवासों की समीक्षा, संरक्षण में आने वाली विभिन्न चुनौतियों और समुदाय आधारित संरक्षण की आवश्यकता के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने कहा कि ग्रामीण स्तर पर किसानों और लोगों की भागीदारी के बिना सारस संरक्षण के लक्ष्यों को हासिल नहीं किया जा सकता, उन्होंने जहर मुक्त कृषि अपनाने की अपील की।
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जिला अधीक्षक कृषि अधिकारी नीलेश कानवड़े ने कृषि आदान विक्रेताओं का मार्गदर्शन करते हुए कहा कि पर्यावरण संरक्षण व टिकाऊ कृषि व्यवस्था में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। रासायनिक कीटनाशक, शाकनाशी और अन्य रसायन जो पर्यावरण के लिए हानिकारक हैं, जैव विविधता के लिए खतरा हैं और सरकार द्वारा प्रतिबंधित हैं, उन्हें किसानों को नहीं बेचा जाए।
विशेषज्ञों ने किसानों को किया जागरूक
ऐसे रसायनों का उपयोग मिट्टी के स्वास्थ्य को खराब करता है, जल स्रोतों को दूषित करता है, लाभकारी कीड़ों और पक्षियों पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है और पारिस्थितिक संतुलन को बिगाड़ता है। उन्होंने बताया कि रसायन विशेष रूप से सारस जैसी जैव विविधतामहत्वपूर्ण प्रजातियों के आवास पर गंभीर प्रभाव डाल सकते हैं।
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कृषि वैज्ञानिक राजा चौहान ने टिकाऊ कृषि पद्धतियों पर मार्गदर्शन दिया। उन्होंने उपस्थित लोगों को मृदा स्वास्थ्य संरक्षण, जल प्रबंधन, जैविक व जैविक आदानों का संतुलित उपयोग, उत्पादन लागत में बचत व पर्यावरण अनुकूल कृषि तकनीक अपनाने के बारे में विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने कहा कि टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाने से कृषि उत्पादकता के साथ-साथ जैव विविधता का संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण हासिल किया जा सकता है।
