राजनीति में मनुष्य की उन्नति का विचार नहीं होता, ऐसी संस्कृति हमारी कैसे? शरद बाविस्कर का सवाल

Sharad Baviskar: गडचिरोली में आयोजित व्याख्यान में जेएनयू के प्राध्यापक प्रा. डॉ. शरद बाविस्कर ने सांस्कृतिक वर्चस्ववाद और राजनीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि जहां मनुष्य की उन्नति का विचार नहीं होता।
JNU professor speech
Sharad Baviskar:गडचिरोली में आयोजित व्याख्यान (सोर्सः सोशल मीडिया)
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Gadchiroli Lecture: जब कोई एक ही संस्कृति वर्चस्व का दावा करने लगती है, तब वहां राजनीति जन्म लेती है। जहां मनुष्य की उन्नति का विचार नहीं किया जाता, वह संस्कृति हमारी कैसे हो सकती है। यह तीखा सवाल नई दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्राध्यापक एवं विचारक प्रा. डॉ. शरद बाविस्कर ने उठाया। वे दंडकारण्य शैक्षणिक, सांस्कृतिक विकास एवं अनुसंधान संस्था के संस्थापक गोविंदराव मुनघाटे की जयंती के अवसर पर कमल-गोविंद प्रतिष्ठान की ओर से सोमवार को सुमानंद सभागृह में आयोजित “हम और हमारी सांस्कृतिक राजनीति” विषयक व्याख्यान में बोल रहे थे।

इस अवसर पर संस्था के सचिव डॉ. प्रमोद मुनघाटे, अध्यक्ष डॉ. राजाभाऊ मुनघाटे तथा उपाध्यक्ष अनिल मुनघाटे उपस्थित थे। प्रा. डॉ. बाविस्कर ने कहा कि कल्चर और सिविलाइजेशन दो अलग-अलग अवधारणाएं हैं। सिविलाइजेशन में वर्चस्ववाद की गंध होती है, जबकि संस्कृति स्वभाव से गतिशील होती है। यदि संस्कृति का विकास नहीं होगा, तो समाज परावलंबी बन जाएगा। संस्कृति भौतिक जीवन के पुनर्निर्माण की एक सतत प्रक्रिया है। यदि हमारे सांस्कृतिक जीवन में हमारी उन्नति का विचार नहीं किया जाता या हमें संस्कृति से जुड़े नियमों को बदलने का अधिकार नहीं है, तो ऐसी संस्कृति हमारी कैसे हो सकती है। यह प्रश्न उन्होंने दोहराया।

सांस्कृतिक व्यवहार की समीक्षा

उन्होंने कहा कि सांस्कृतिक व्यवहार की समीक्षा लोकतांत्रिक मूल्यों के आधार पर होनी चाहिए। जब कोई एक संस्कृति वर्चस्व का दावा करती है, तब वहां राजनीति हावी हो जाती है। उन्होंने तीखी आलोचना करते हुए कहा कि जिनका शिक्षा से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है, वे शैक्षणिक नीतियां तय कर रहे हैं। नई शिक्षा नीति में भारतीय संस्कृति के वैज्ञानिक अध्ययन को सीमित करने की प्रवृत्ति दिखाई देती है, जो चिंताजनक है।

संस्कृति किसी मठ या धार्मिक ग्रंथों में सीमित नहीं होती

प्रा. डॉ. बाविस्कर ने स्पष्ट किया कि संस्कृति किसी मठ या धार्मिक ग्रंथों में सीमित नहीं होती, बल्कि वह सामूहिक जीवन से जुड़ी होती है। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि भारत में सामाजिक लोकतंत्र न आए, इसकी व्यवस्था पहले से ही की जा चुकी है और सांस्कृतिक जीवन को कमजोर करने के प्रयास हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस देश में जितना अधिक व्यक्ति बुद्धि-विरोधी होता है, उतना ही ऊंचा पद उसे मिलता है। यह स्थिति एक प्रकार की प्रतिक्रांति को दर्शाती है।

उन्होंने यह भी कहा कि वैश्विक मूल्य कमजोर पड़ते जा रहे हैं और सांस्कृतिक वर्चस्ववाद के इस दौर में हम धीरे-धीरे बिकते जा रहे हैं। कार्यक्रम के दौरान उपस्थित बुद्धिजीवी नागरिकों द्वारा पूछे गए विभिन्न प्रश्नों के उत्तर भी प्रा. डॉ. बाविस्कर ने दिए। कार्यक्रम का संचालन प्रा. डॉ. नरेंद्र आरेकर ने किया, जबकि प्रस्तावना डॉ. प्रमोद मुनघाटे ने रखी।

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