

Gadchiroli Naxalism: नक्सलवाद के साये से बाहर निकल चुके गड़चिरोली जिले में अब वर्षों से कर्मचारियों को मिल रहे नक्सल भत्ते पर भी कैंची चलने की संभावना जताई जा रही है। जिले की बदली सुरक्षा स्थिति के बाद नक्सल प्रभावित क्षेत्र के आधार पर सरकारी कर्मचारियों को दिए जा रहे विशेष भत्तों और अन्य आर्थिक सुविधाओं की समीक्षा शुरू होने की चर्चा प्रशासनिक हलकों में है। गृह विभाग और आदिवासी विकास विभाग के स्तर पर इस संबंध में मंथन चलने की बात सामने आ रही है।
हालांकि, नक्सल भत्ता बंद करने का अंतिम निर्णय अभी नहीं हुआ है। शासन स्तर पर समीक्षा के बाद ही इस संबंध में कोई अंतिम फैसला होने की संभावना है। नक्सल प्रभावित और दुर्गम क्षेत्रों में प्रतिकूल परिस्थितियों में काम करनेवाले कर्मचारियों को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार ने विभिन्न विभागों में विशेष आर्थिक सुविधाएं लागू की हैं। पुलिस विभाग के साथ-साथ शिक्षा, आदिवासी विकास, स्वास्थ्य और जिला परिषद से जुड़े कर्मचारियों को भी अलग-अलग नियमों के तहत प्रोत्साहन अथवा कठिन क्षेत्र भत्ते का लाभ मिलता है।
नक्सल गतिविधियों में कमी आने के बाद अब सवाल उठ रहा है कि जिन परिस्थितियों के आधार पर ये विशेष लाभदिए गए थे, वे परिस्थितियां वर्तमान में कितनी प्रासंगिक हैं। नक्सल गतिविधियों में कमी और सुरक्षा स्थिति में सुधार के बाद सरकार के सामने यह सवाल है कि नक्सल प्रभावित क्षेत्र के नाम पर मिलनेवाली विशेष आर्थिक सुविधाएं कब तक जारी रखी जाएं। वित्तीय भार कम करने की दृष्टि से भत्तों की समीक्षा को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
दूसरी ओर,कर्मचारियों का तर्क है कि नक्सलवाद कम होने के बावजूद गड़चिरोली के कई इलाके आज भी अत्यंत दुर्गम हैं। जंगल, नदी-नाले, खराब परिवहन व्यवस्था और सीमित बुनियादी सुविधाओं के कारण यहां काम करने की परिस्थितियां मैदानी जिलों से अलग हैं। पुलिस विभाग पर सबसे बड़ा असर नक्सल विरोधी अभियान में तैनात पुलिस अधिकारी-कर्मचारियों को विशेष आर्थिक लाभ दिए जाते हैं। संवेदनशील और अतिसंवेदनशील क्षेत्रों में तैनाती के लिए विशेष वेतन संबंधी प्रावधान भी लागू हैं।
सी-60 जैसे विशेष दस्ते के जवानों को उनकी जिम्मेदारियों के अनुरूप अलग सुविधाएं मिलती हैं। यदि सरकार नक्सल प्रभावित क्षेत्र के आधार पर मिलनेवाले लाभों में बदलाव करता है, तो इसका सबसे बड़ा प्रभाव पुलिस विभाग पर पड़ने की संभावना है। विभिन्न विभागों में दिए जा रहे विशेष भत्तों को यदि भविष्य में समाप्त किया जाता है, तो सरकार के वेतन-भत्ता खर्च में बड़ी कमी आने की संभावना है।
प्रशासनिक स्तर पर इसे हर महीने करोड़ों रुपये की संभावित बचत से जोड़कर देखा जा रहा है। नक्सल प्रभावित तथा आदिवासी क्षेत्रों में कार्यरत शिक्षकों को प्रोत्साहन भत्ता दिया जाता रहा है। दूरस्थ क्षेत्रों में डॉक्टरों, नर्सों, एएनएम और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों को भी कठिन क्षेत्र के लिए विशेष आर्थिक प्रोत्साहन की व्यवस्था है। इसलिए नक्सल क्षेत्र की श्रेणी में बदलाव का प्रभाव केवल पुलिस विभाग तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि कई विभागों के कर्मचारियों की आय पर इसका असर पड़ सकता है।
गड़चिरोली के नक्सल प्रभावित जिले से बदलती पहचान के साथ अब वर्षों पुरानी विशेष आर्थिक सुविधाओं के भविष्य पर भी सवाल खड़ा हो गया है। गृह विभाग और आदिवासी विकास विभाग की समीक्षा के बाद तस्वीर साफ होने की उम्मीद है। नक्सल भत्ता रहेगा, घटेगा या पूरी तरह बंद होगा इस पर अब सरकार के अंतिम फैसले का इंतजार है।
यदि सरकार नक्सल प्रभावित क्षेत्र के आधार पर मिलने वाले भत्ते को समाप्त करने का निर्णय लेता है, तो कर्मचारियों की ओर से दुर्गम और पिछड़े क्षेत्रों के आधार पर वैकल्पिक भत्ता जारी रखने की मांग उठ सकती है। इससे सरकार का आर्थिक बोझ नियंत्रित करने के साथ-साथ दूरस्थ क्षेत्रों में कर्मचारियों की उपलब्धता बनाए रखने का रास्ता भी निकल सकता है।