

Highlights
मराठवाड़ा में अक्टूबर महीने में ही 109 सिंचाई परियोजनाएं पूरी तरह सूख गई हैं।
सूखी परियोजनाओं में 103 लघु और छह मध्यम सिंचाई परियोजनाएं शामिल हैं।
जलसंचय की कमी से रबी की बुआई और फसलों की सिंचाई प्रभावित होने की आशंका है।
Marathwada Water Shortage: मराठवाड़ा में गर्मी आने से पहले ही जलसंकट ने खतरे की घंटी बजा दी है। अक्टूबर में ही क्षेत्र की 109 सिंचाई परियोजनाएं पूरी तरह सूख चुकी हैं। इनमें 103 लघु और छह मध्यम परियोजनाएं शामिल हैं। वर्षा ऋतु समाप्त होने के तुरंत बाद जलस्रोतों की यह स्थिति आने वाले महीनों की गंभीर तस्वीर पेश कर रही है।
यदि यही हालात बने रहे, तो गर्मी के दिनों में ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल की उपलब्धता बनाए रखना और किसानों के लिए सिंचाई का पानी जुटाना बड़ी चुनौती बन सकता है। मराठवाड़ा में खेती और ग्रामीण पेयजल व्यवस्था काफी हद तक वर्षा तथा स्थानीय जलाशयों पर निर्भर है।
इस बार पर्याप्त जलसंचय नहीं होने से अनेक परियोजनाएं खाली हो गई हैं। इन जलस्त्रोतों पर निर्भर गांवों की चिंता बढ़ गई है। अक्टूबर में ही इतनी बड़ी संख्या में परियोजनाओं का सूख जाना इस बात का संकेत है कि उपलब्ध पानी का उपयोग अब बेहद सावधानी से करना होगा। वर्षा के दौरान जलाशयों में पर्याप्त पानी जमा नहीं होने का असर अब साफ दिखाई देने लगा है।
मानसून की विदाई के बाद पानी की नई आवक सीमित हो जाती है। ऐसे में बचा हुआ जलसंचय अगले वर्षा काल तक ग्रामीणों की जरूरतें पूरी करने के लिए महत्वपूर्ण होता है। लेकिन 109 परियोजनाओं के सूखने से स्थानीय जलस्रोतों पर निर्भर क्षेत्रों में संकट गहराने की आशंका है। प्रशासन के सामने अब शेष जलसंचय का आकलन करने, पानी के उपयोग की प्राथमिकताएं तय करने और संभावित प्रभावित गांवों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था तैयार करने की चुनौती है। संकट गहराने के बाद कदम उठाने के बजाय अभी से तैयारी करना आवश्यक होगा।
रबी की खेती पर भी संकट जलाशयों के सूखने का असर किसानों पर पड़ सकता है। खरीफ की फसलों को वर्षा की अनियमितता का सामना करना पड़ा है। अब रबी की बुआई और फसलों की सिंचाई के लिए पानी जुटाना कठिन हो सकता है। जिन क्षेत्रों में सिंचाई परियोजनाएं सूख चुकी हैं, वहां किसानों को कुओं और नलकूपों पर निर्भर होना पड़ सकता है। भूजल स्तर भी गिरा तो खेती की लागत बढ़ने और उत्पादन प्रभावित होने का खतरा है।
स्थानीय जलस्रोतों के सूखने से ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल संकट बढ़ सकता है। जिन गांवों की पानी की जरूरतें छोटे बांधों और जलाशयों पर निर्भर हैं, वहां वैकल्पिक स्रोतों की आवश्यकता पड़ सकती है। ऐसे में टैंकरों से आपूर्ति की मांग बढ़ने की आशंका है प्रशासन को संभावित प्रभावित गांवों की पहचान, वैकल्पिक जलस्रोतों की तलाश और आपातकालीन पेयजल व्यवस्था की तैयारी पहले से करनी होगी। साथ ही पानी की बर्बादी रोकने और उपलब्ध जलसंचय का विवेकपूर्ण उपयोग सुनिश्चित करना होगा।
अक्टूबर में ही 109 सिंचाई परियोजनाओं का सूख जाना जल प्रबंधन के लिए गंभीर चेतावनी है। जलस्रोतों की नियमित निगरानी, भूजल पुनर्भरण, पानी के रिसाव और बर्बादी पर रोक तथा पेयजल को प्राथमिकता देना समय की मांग है। अक्टूबर में सूखे बांध आने वाली गर्मी के संकट का संकेत दे रहे है। समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो गर्मी बढ़ने के साथ मराठवाड़ा के गांवों में पेयजल और खेती से जुड़ी मुश्किलें गंभीर रूप ले सकती हैं। आने वाले समय में और गंभीर समस्या बन सकती है।