विदर्भ में धान खरीदी संकट: भंडारण की कमी और मिलिंग में देरी से प्रक्रिया ठप; किसान सभा ने उठाई सुधार की मांग
भंडारा, गोंदिया और गड़चिरोली में धान खरीदी प्रक्रिया में अव्यवस्था से किसान परेशान हैं। गोदामों की कमी और मिलिंग में देरी के कारण सुधार की मांग उठाई गई है।
Bhandara Paddy Procurement Crisis News: विदर्भ के भंडारा, गोंदिया और गड़चिरोली जिलों में धान भंडारण और मिलिंग व्यवस्था में मची अफरातफरी के कारण धान खरीदी की प्रक्रिया पूरी तरह लड़खड़ा गई है।
इस अव्यवस्था का सीधा खामियाजा स्थानीय किसानों और सहकारी संस्थाओं को भुगतना पड़ रहा है। गोदामों की भारी कमी और चावल के उठाव में हो रही देरी के विरोध में भंडारा जिला किसान सभा ने केंद्र व राज्य सरकार को ज्ञापन सौंपकर तत्काल सुधार की मांग की है।
किसान सभा के जिलाध्यक्ष माधवराव बांते की ओर से केंद्रीय खाद्य मंत्री, मुख्यमंत्री और राज्य के खाद्य व नागरिक आपूर्ति मंत्री को भेजे गए निवेदन में बताया गया कि इन तीनों जिलों में हर साल लगभग 50 से 60 लाख क्विंटल धान की सरकारी खरीदी की जाती है, जबकि कुल उत्पादन 150 से 200 लाख क्विंटल तक पहुंचता है।
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इस बड़े पैमाने पर उत्पादन के बावजूद शासन के पास पर्याप्त भंडारण क्षमता नहीं है, जिससे खरीदी प्रक्रिया शुरू होते ही बाधाएं आने लगती हैं। निवेदन में स्पष्ट किया गया कि सीमित क्षमता के कारण एक महीने के भीतर ही सभी गोदाम भर जाते हैं।
इसके बाद पूरी प्रक्रिया चावल की मिलिंग और उठाव पर निर्भर हो जाती है। परिवहन व्यवस्था में देरी और समय पर जिलावार मैपिंग न होने के कारण खरीदी केंद्र बार-बार बंद करने पड़ते हैं, जिससे किसान परेशान हैं।
गोदाम क्षमता का भारी अभाव भंडारा, गोंदिया और गड़चिरोली जिलों में धान का रिकॉर्ड उत्पादन होता है, लेकिन सरकारी गोदामों की क्षमता मात्र 20 से 30 लाख क्विंटल ही है। किसान सभा ने मांग की है कि इन तीनों जिलों के लिए स्वतंत्र और उच्च क्षमता वाले स्थायी गोदामों का निर्माण किया जाए ताकि भविष्य में खरीदी प्रक्रिया सुचारू रूप से चल सके।
नमी को पूर्ण मान्यता देने की मांग
वर्तमान नियमों के अनुसार, शासन खरीदी के समय 17 प्रतिशत नमी स्वीकार करता है। लंबे समय तक भंडारण के कारण नमी कम होने से लगभग 5 प्रतिशत तक की प्राकृतिक घट आती है। किसान सभा का आरोप है कि सरकार केवल 1 प्रतिशत घट मान्य करती है और शेष नुकसान की वसूली सहकारी संस्थाओं से की जाती है।
संगठन ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों का हवाला देते हुए पूरी प्राकृतिक घट को शासन की ओर से वहन करने की मांग की है।
