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भंडारा जिले में आज भी जीवित है आग्रह की पंगत परंपरा, बफे के बीच कायम ग्रामीण स्वाद, आधुनिक व्यवस्था पड़ी फीकी

भंडारा जिले के गांवों में आज भी पारंपरिक पंगत की मिठास कायम है। शादी समारोहों में ग्रामीण स्वाद और आत्मीयता का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।

  • Author By Manish Vishwabhno | published By महाराष्ट्र डेस्क |
Updated On: Apr 21, 2026 | 09:04 PM
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Bhandara News: बदलते समय के साथ शादी समारोहों का स्वरूप भले ही तेजी से बदल रहा हो और शहरों के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में भी बफे पद्धति का चलन बढ़ा हो, लेकिन भंडारा जिले के गांवों में आज भी पारंपरिक पंगत की मिठास कायम है. पत्तल पर परोसे जाने वाले व्यंजन और मेहमानों को प्रेमपूर्वक आग्रह कर भोजन कराने की परंपरा आज भी लोगों के दिलों में खास स्थान रखती है. महंगे कैटरिंग के बावजूद इस आत्मीयता के सामने आधुनिक व्यवस्था फीकी पड़ती नजर आती है.

महिलाओं और आचार्यों की सामूहिक भागीदारीग्रामीण क्षेत्रों में पंगत का आयोजन किसी बड़े प्रबंधन से कम नहीं होता. शादी के भोजन के लिए गांव के ही अनुभवी रसोइयों को बुलाया जाता है. मुख्य खाना बनाने के साथसाथ गांव की महिलाएं भी बड़ी संख्या में सहयोग करती हैं. सब्जियां साफ करना, मसाले तैयार करना, लहसुन छीलना और खासतौर पर रोटियां बनाना जैसे कार्य महिलाएं मिलजुलकर करती हैं.

यह कार्य मजदूरी के रूप में नहीं, बल्कि आपसी सहयोग और सामाजिक भावना से किया जाता है.युवाओं की निःस्वार्थ सेवा बनी मिसालपंगत की सबसे बड़ी विशेषता गांव के युवाओं की भागीदारी है. जहां शहरों में हर काम के लिए कैटरिंग स्टाफ बुलाया जाता है, वहीं गांवों में युवा खुद आगे आकर जिम्मेदारी संभालते हैं. वार्ड या मित्र मंडल के अनुसार टीमें बनती हैं, जो मेहमानों को पानी देने से लेकर भोजन परोसने तक का कार्य करती हैं.

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खास बात यह है कि ये युवा बिना किसी मेहनताना के सेवा करते हैं. उन्हें यजमान द्वारा दिया गया चायपानी और भोजन ही पर्याप्त लगता है.पारंपरिक अनुशासन और आत्मीयतापंगत में भोजन परोसने का एक निश्चित क्रम होता है, जिसे युवा अच्छी तरह जानते हैं. नमक, चटनी, सब्जी और मुख्य व्यंजन परोसने का क्रम अनुशासित तरीके से निभाया जाता है. इस पूरी प्रक्रिया में अनुशासन के साथसाथ अपनापन भी झलकता है, जो मेहमानों को विशेष अनुभव देता है.आचारी क्रिष्णा शहारे का कहना है, एक ही दिन कई शुभ मुहूर्त होने से आचारियों और परोसने वालों की कमी हो जाती है. सीजन में मजदूरी बढ़ने के बावजूद कामगार नहीं मिलते. साथ ही भीषण गर्मी के कारण कामगारों को टिकाए रखना भी चुनौती बन गया है.

Tradition of insistence is still alive in the district

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Published On: Apr 21, 2026 | 08:41 PM

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