Bhandara News: नागझिरा वन परिसर के आसपास के गावों में पारंपरिक हस्तशिल्प लकड़ी उद्योग एक बार फिर नई पहचान बना रहा है। स्थानीय कारीगरों द्वारा तैयार किए जा रहे लकड़ी सागवान के हस्तशिल्प फर्नीचर उत्पादों को हाल के वर्षों में बाज़ार में बढ़ती मांग मिल रही है।
पर्यटन सीजन शुरू होते ही इन उत्पादों की बिक्री में खासा उछाल देखा जा रहा है। प्राकृतिक सागवान फर्नीचर से तैयार अनोखी कलाकृतियांनागझिरा हॉडक्राप्ट वुडेन इंडस्ट्री के संचालक अनिकेत कठाने ने बताया कि नागझिरा के जंगलों में उपलब्ध सागौन, तेंदू, बांस और अन्य वनसंपदा का उपयोग सुरक्षित व नियमों के अनुसार करते हुए कारीगर शोपीस, नक्काशीदार मूर्तियां, घर सजावट की वस्तुएं, बांस फर्नीचर, पारंपरिक टोकरियां और आधुनिक डिजाइन के वुडन क्राफ्ट तैयार कर रहे हैं।
पिछले अनेक वर्षों वो आनलाइन सेवा देने के कारण देश विदेश से भी अधिक मांग होने से उनकी मांग के अनुसार पूर्ति कर रहे हैं। वह उच्च शिक्षित इंजीनियर होकर भी नौकरी के पीछे न जाते हुए स्थानीय कारीगरों को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से मूल्यवान सागवान की देशविदेश में पहचान हो इस उद्देश्य से यह व्यवसाय चुना है। हॉडक्राप्ट वुडेन इंडस्ट्री में काम कर रहे स्थानीय कारीगर बताते हैं कि पीढ़ियों से चली आ रही यह कला आज भी ग्रामीणों की आजीविका का महत्वपूर्ण आधार बनी हुई है।
कारीगरों को रोजगार का बड़ा स्रोतइस क्षेत्र में लगभग सैकड़ों परिवार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस उद्योग से जुड़े हैं। साकोली, नवेगांव बांध, कोहमारा, वडेगांव, पिटेझरी, सानगडी आदि गांवों में कारीगर उनके यहां काम कर रहे हैं। महिलाएं भी सागवान तथा बांस आधारित उत्पादन बनाकर अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत कर रही हैं।
पर्यटन से बढ़ा स्थानीय बाज़ारनागझिरा टाइगर रिजर्व में प्रतिवर्ष हजारों पर्यटक आते हैं। इनमें से कई पर्यटक स्थानीय हस्तशिल्प वस्तुएं स्मृति चिन्ह के रूप में खरीदते हैं, या आनलाईन बुलाते हैं। स्थानीय उमेश कठाने का कहना है कि पिछले दो वर्षों से लकड़ी सागवानबांस हस्तशिल्प की मांग लगातार बढ़ रही है। पर्यटक स्थानीय कला को खूब पसंद कर रहे हैं। उनके यहां आधुनिक मशीनों के की सहायता से हस्तशिल्प अनेक वस्तुएं बनाई जाती है।
सरकारी योजनाओं का मिल रहा सहारावन विभाग, ग्राम विकास विभाग तथा जिला उद्योग केंद्र के माध्यम से कारीगरों को प्रशिक्षण, स्टॉल उपलब्धता और लोन सहायता दी जा रही है। इससे कारीगरों के उत्पादों को बेहतर डिज़ाइन, पैकिंग और ब्रांडिंग में मदद मिल रही है।
चुनौतियां अब भी बरकरारकच्चे माल की सीमित उपलब्धता, आधुनिक मशीनरी का अभाव, बड़े शहरों तक मार्केटिंग की कमी, ऑनलाइन बिक्री के अवसरों का अभाव है। उमेश कठाने का कहना है कि यदि सरकार और गैरसरकारी संस्थाएं मिलकर मार्केटिंग और ईकॉमर्स पर ध्यान दें, तो यह उद्योग और तेजी से आगे बढ़ सकता है। उनके द्वारा सागवान से ऐसी वस्तुएं तैयार की जा रही जो पर्यावरण पूरक है और इको फ्रेंडली भी है ग्रामीण क्षेत्र में इस उद्योग की शुरुआत की है तथा अमेजॉन के माध्यम से भी देशविदेश में इसकी बिक्री हो रही है।