ईरान-इजरायल जंग की पहली 'चोट' विदर्भ पर! डॉलर और दीनार कमाने वाली सब्जियां कौड़ियों के दाम बिकने को हुई मजबूर

Iran Israel War Impact India: ईरान-इजरायल युद्ध की मार भंडारा के किसानों पर। सब्जी निर्यात ठप्प होने से मंडियों में सड़ रहा माल। 200 टन आवक से बाजार ध्वस्त, किसान दाने-दाने को मोहताज।
Iran-Israel conflict halts vegetable exports from Bhandara, Maharashtra. 200 tons of veggies rot in markets as Gulf trade shuts down, hitting farmers hard.
महात्मा फुले सब्जी मार्केट एसोसिएशन (सौजन्य-नवभारत)
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Gulf Market Shutdown: ईरान और इजरायल के बीच धधक रही युद्ध की चिंगारी ने सात समंदर पार महाराष्ट्र के भंडारा जिले के किसानों की कमर तोड़ दी है। अंतरराष्ट्रीय संघर्ष का ऐसा घातक असर हुआ है कि जिले का फलता-फूलता सब्जी निर्यात रातों-रात धराशायी हो गया। जो सब्जियां कल तक डॉलर और दीनार कमा रही थीं, आज वे मंडियों में कौड़ियों के भाव बिकने को मजबूर हैं।

विदर्भ की सबसे बड़ी मंडियों में शुमार भंडारा की महात्मा फुले सब्जी मार्केट में आज सन्नाटा और मायूसी पसरी है। प्रतिदिन खाड़ी देशों को भेजी जाने वाली 15 से 20 टन उच्च गुणवत्ता वाली भिंडी का स्टॉक अब गोदामों में सड़ रहा है। हवाई और समुद्री मार्ग पर लगे कड़े प्रतिबंधों ने निर्यात की सप्लाई चेन को पूरी तरह काट दिया है।

आर्थिक संकट में किसान

भंडारा की गुणवत्तापूर्ण सब्जियां अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचती थीं, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होती थी। लेकिन अंतरराष्ट्रीय युद्ध और परिवहन की बाधाओं ने निर्यात श्रृंखला को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है। निर्यात ठप्प होने से किसान बड़े संकट में हैं और माल को ठिकाने लगाना भी कठिन हो गया है।

  • महेंद्र मेंढे, अध्यक्ष, महात्मा फुले सब्जी मार्केट एसोसिएशन।

- ईरान-इजरायल संघर्ष से भंडारा का सब्जी निर्यात ठप्प - विदेशी बाजार बंद, मंडियों में सड़ रही किसानों की सब्जियां - 200 टन सब्जी की आवक से बाजार ध्वस्त, किसान बेहाल - ट्रांसपोर्ट संकट और निर्यात बंद, सब्जियां हो रहीं बर्बाद - युद्ध ने तोड़ी किसानों की कमर, लागत निकालना भी मुश्किल - खाड़ी बाजार बंद होते ही भंडारा की सब्जी मंडी में सन्नाटा

गर्मी और देरी के कारण सब्जियां खराब

भंडारा जिले से रोजाना औसतन 200 टन सब्जियां (मिर्च, कद्दू, ककड़ी, टमाटर और करेला) न केवल खाड़ी देशों, बल्कि श्रीलंका, नेपाल और बांग्लादेश भी भेजी जाती हैं। जब निर्यात के दरवाजे बंद हुए, तो यह सारा माल स्थानीय बाजार में बाढ़ की तरह आ गया। मांग कम और आवक बेहिसाब होने से सब्जियों के दाम 50% से भी नीचे गिर चुके हैं।

किसान अपनी लागत निकालने के लिए भी दर-दर भटक रहा है। युद्ध की अनिश्चितता और दहशत का असर सड़कों पर भी दिख रहा है। ट्रांसपोर्ट व्यवसायी लंबी दूरी के रूट पर गाड़ियां भेजने से कतरा रहे हैं। इसका नतीजा यह है कि ट्रकों की कमी से माल मंडियों में ही डंप हो गया है। गर्मी और देरी के कारण सब्जियां खराब हो रही हैं, जिससे मजबूरन किसानों को अपनी मेहनत कचरे के ढेर में फेंकनी पड़ रही है।

पसीने से सींची गई फसल को अपनी आंखों के सामने बर्बाद होता देख किसानों का धैर्य जवाब दे रहा है। स्थानीय उत्पादकों का कहना है कि अगर यह युद्ध लंबा खिंचा, तो भंडारा का कृषि ढांचा पूरी तरह ढह जाएगा। बीज, खाद और मजदूरी का खर्च निकालना भी अब एक दिवास्वप्न बन गया है।

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