नरेंद्र भोंदेकर और परिणय फुके (सौजन्य-सोशल मीडिया)
Maharashtra Local Body Polls: भंडारा नप चुनाव के अंतिम दौर में जिले की राजनीति बेहद आक्रामक हो गई है। विधायक नरेंद्र भोंडेकर और विधायक परिणय फुके के बीच खुला विवाद सामने आया है, जिससे राजनीतिक वातावरण और भी तनावपूर्ण बन गया है। विधायक नरेंद्र भोंडेकर ने कहा कि चुनाव आचार संहिता लागू है, ऐसे में कोई भी शासकीय तंत्र पर दबाव नहीं डाल सकता।
उन्होंने आरोप लगाया कि विरोधी पक्ष अपने परिवार की महिलाओं को मैदान में उतारता है तो उसे उचित माना जाता है, जबकि वे सत्ता पक्ष में होने के बावजूद लगातार निशाना बनाए जा रहे हैं। भोंडेकर ने मुख्यमंत्री के संदर्भ में कहा कि आज वे मुख्यमंत्री हैं क्योंकि इन्होंने उनको वोट दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि उनके परिवार तक पहुंचकर अनुचित भाषा का उपयोग किया जा रहा है।
भोंडेकर ने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि राजनीतिक मर्यादाएं नहीं पाली गईं, तो वे भी मंत्रियों के भ्रष्टाचार और पैसों के लेनदेन का खुलासा करने से पीछे नहीं हटेंगे। उन्होंने कहा कि जो लोग महिलाओं के प्रति अशोभनीय भाषा का प्रयोग करते हैं, वे मित्र दल कहलाने योग्य नहीं हैं, उनसे तो बेहतर कांग्रेस है।
दूसरी ओर, विधायक परिणय फुके ने पलटवार करते हुए कहा कि शिवसेना के पास कोई विशेष ताकत न होने के बावजूद भंडारा सीट उन्हें दी गई थी और भाजपा कार्यकर्ताओं के समर्थन से ही भोंडेकर विधायक बने। उन्होंने कहा कि 132 भाजपा विधायक, 5 निर्दलीय और 41 राष्ट्रवादी (अजित पवार गुट) विधायक मिलकर स्थिर बहुमत देते हैं। फुके ने कहा कि यदि भोंडेकर को कांग्रेस की ओर आकर्षण महसूस हो रहा है, तो वे वहाँ जाने के लिए स्वतंत्र हैं।
सहकार क्षेत्र से जुड़े चुनावों के समय से ही विधायक नरेंद्र भोंडेकर और विधायक परिणय फुके के बीच तनाव की स्थिति बनी हुई है, लेकिन इस नगर परिषद चुनाव ने इस मतभेद को चरम स्तर तक पहुंचा दिया है। राजनीति अब निचले स्तर तक पहुंच चुकी है। दोनों दल सत्ता गठबंधन का हिस्सा होने के बावजूद एक-दूसरे पर सार्वजनिक मंचों से तीखे आरोप लगा रहे हैं।
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राजनीतिक मर्यादा को दरकिनार करते हुए व्यक्तिगत टिप्पणियां, महिलाओं पर की गई अनुचित भाषा और भ्रष्टाचार के आरोप सत्तारूढ़ दलों के भीतर गहरी खाई को दर्शाते हैं। यह स्थिति न केवल चुनावी वातावरण को दूषित कर रही है, बल्कि गठबंधन सरकार की छवि पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल रही है।
वोटिंग से ठीक दो दिन पहले जिस तरह से बयानबाजी उग्र हुई है, उससे क्षेत्र में ध्रुवीकरण बढ़ने की संभावना है। पैसे बांटने और उसे स्वीकारने जैसे आरोप भी खुले मंचों पर लगाए जा रहे हैं, जो चुनाव प्रक्रिया की पवित्रता पर सवाल खड़े करते हैं।