आजीवन रक्त रोग से जूझ रहे, डेकेयर सेंटर बना सहारादिन विशेष
जिले में हीमोफिलिया के मरीजों के लिए नया डेकेयर सेंटर शुरू, मुफ्त फैक्टर इंजेक्शन की सुविधा से मिली राहत। जानें बीमारी और उपचार के बारे में।
Bhandara District: भंडारा जिले में इस समय हीमोफिलिया के 43 मरीज दर्ज किए गए हैं, जो इस दुर्लभ और आजीवन रहने वाले रक्त विकार से जूझ रहे हैं. पिछले वर्ष मरीजों की संख्या 40 थी, जिसमें 3 की वृद्धि हुई है. 17 अप्रैल विश्व हीमोफिलिया दिवस के अवसर पर स्वास्थ्य विभाग ने इस बीमारी के लक्षणों और उपलब्ध उपचार सुविधाओं को लेकर जनजागरूकता बढ़ाने पर जोर दिया है.
क्या है हीमोफिलियाहीमोफिलिया एक अनुवांशिक रक्त विकार है, जिसमें मरीज के शरीर में फैक्टर 8 VIII या फैक्टर 9 IX की कमी होती है, जो खून को जमाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. इस कमी के कारण छोटी सी चोट लगने पर भी रक्तस्राव आसानी से बंद नहीं होता. बचपन में खेलते समय चोट लगना, दांत गिरते समय अधिक खून बहना या शरीर के अंदरूनी हिस्सों में रक्तस्राव होना इसके प्रमुख लक्षण हैं.
इस बीमारी का स्थायी इलाज फिलहाल उपलब्ध नहीं है, लेकिन समय पर फैक्टर देने से मरीज सामान्य जीवन जी सकता है.महंगे इलाज से मिली राहतहीमोफिलिया मरीजों के लिए जरूरी क्लॉटिंग फैक्टर इंजेक्शन काफी महंगे होते हैं. एक डोज की कीमत करीब 3 से 5 हजार रुपये तक होती है, जो आम परिवारों के लिए वहन करना मुश्किल है. पहले इलाज के लिए मरीजों को नागपुर जाना पड़ता था, लेकिन अब स्थिति बदल गई है.जिला अस्पताल में डेकेयर सेंटर की सुविधाभंडारा जिला अस्पताल में वर्ष 2024 से हीमोफिलिया डेकेयर सेंटर शुरू किया गया है.
सम्बंधित ख़बरें
अनुसूचित जाति आरक्षण उपवर्गीकरण का विरोध, राष्ट्रीय चर्मकार महासंघ ने मुख्यमंत्री को सौंपा ज्ञापन
अधिकारियों को दिए अधुरे काम पूरा करें, CEO बैठक मंगरुलपीर पंचायत समिति में विकास कार्यों की हुई समीक्षा
भंडारा जिले में किसानों का निकला मोर्चा, धान की लिमिट बढ़ाने की मांग
राजस्व मंत्री के आश्वासन से बंधी उम्मीदें, समर्थन मूल्य से 700 से 800 रुपये प्रति क्विंटल कम दाम पर बेचना पड़
इस केंद्र के माध्यम से पंजीकृत मरीजों को आवश्यक फैक्टर इंजेक्शन निःशुल्क उपलब्ध कराए जा रहे हैं. इस सुविधा से मरीजों को बड़ी राहत मिली है और इलाज के लिए भटकना भी कम हुआ है.विशेषज्ञ की रायजिला अस्पताल की सिकल सेल समन्वयक रोहिणी पवार के अनुसार, यह बीमारी अनुवांशिक होती है. गर्भावस्था के 10 से 12 सप्ताह के दौरान एंटीनाटल जांच कराने से यह पता लगाया जा सकता है कि होने वाले बच्चे को हीमोफिलिया है या नहीं. साथ ही, हीमोफिलिया से पीड़ित बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो, इसके लिए स्कूल और समाज में इस बीमारी के प्रति जागरूकता और संवेदनशीलता होना बेहद जरूरी है.
