

Swadeshi Movement First Martyr: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की गाथा केवल बड़े राजनेताओं के नामों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन असंख्य फुट सोल्जर्स के खून से लिखी गई है जिन्होंने देश की आर्थिक आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया।
इन्हीं महान बलिदानियों में एक नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित है शहीद बाबू गेनू सैद। उन्हें स्वदेशी आंदोलन का प्रथम शहीद माना जाता है क्योंकि उन्होंने महात्मा गांधी के स्वदेशी के आह्वान को केवल अपनाया ही नहीं, बल्कि विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के लिए अपनी जान देने वाले वे पहले सत्याग्रही बने।
बाबू गेनू का जन्म 1908 में महाराष्ट्र के पुणे जिले के एक गरीब किसान परिवार में हुआ था। मात्र दो वर्ष की आयु में पिता के निधन और घर के एकमात्र बैल की मृत्यु ने परिवार को गहरे आर्थिक संकट में डाल दिया। पेट पालने के लिए उनकी मां उन्हें लेकर मुंबई आ गईं, जहां बाबू ने कपड़ा मिलों में एक मजदूर के रूप में काम करना शुरू किया। भले ही उनके पास औपचारिक शिक्षा नहीं थी, लेकिन उनके हृदय में राष्ट्रप्रेम की ज्वाला प्रबल थी। वे महात्मा गांधी और लोकमान्य तिलक के विचारों से गहरे प्रभावित थे और जल्द ही कांग्रेस के एक सक्रिय वालंटियर बन गए।
स्वदेशी आंदोलन उस समय अपने चरम पर था। बाबू गेनू और उनके तानाजी पथक संगठन को मुंबई के कालबादेवी रोड पर विदेशी कपड़ों से भरे ट्रकों को रोकने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। 12 दिसंबर 1930 की सुबह, मैनचेस्टर के एक कपड़ा व्यापारी जॉर्ज फ्रेजर का विदेशी कपड़ों से लदा ट्रक पुलिस सुरक्षा में मुलजी जेठा मार्केट से बंदरगाह की ओर निकल रहा था।
सत्याग्रहियों की टोली भारत माता की जय के नारे लगाते हुए सड़क पर लेट गई। पुलिस ने बल प्रयोग किया, प्रदर्शनकारियों को बेरहमी से पीटा और रास्ते से हटाया, लेकिन सत्याग्रही बार-बार ट्रक के सामने आ जाते थे।
ट्रक का चालक एक भारतीय था, जिसका नाम बलबीर सिंह था। जब पुलिस ने उसे प्रदर्शनकारियों के ऊपर ट्रक चढ़ाने का आदेश दिया, तो उसने निडरता से जवाब दिया कि मैं भी भारतीय हूं और वह भी भारतीय है। हम दोनों भाई हैं, तो मैं अपने भाई की हत्या कैसे कर सकता हूं?
बलबीर सिंह के इनकार ने ब्रिटिश अधिकारियों को क्रोध से भर दिया। तब अंग्रेज सार्जेण्ट ने स्वयं ट्रक की कमान संभाली।
जैसे ही ट्रक आगे बढ़ा, 22 वर्षीय बाबू गेनू तिरंगा हाथ में लिए और महात्मा गांधी की जय का जयघोष करते हुए ट्रक के पहियों के ठीक सामने लेट गए। क्रूर अंग्रेज सार्जेण्ट ने बिना हिचकिचाए ट्रक की रफ्तार बढ़ाई और बाबू गेनू को कुचलते हुए निकल गया। कालबादेवी की वह सड़क वीर क्रांतिकारी के खून से लाल हो गई। अस्पताल ले जाते समय रास्ते में ही उन्होंने दम तोड़ दिया।
बाबू गेनू के इस बलिदान ने पूरे देश में आक्रोश की लहर पैदा कर दी। उनके बलिदान की याद में ही 12 दिसंबर को 'स्वदेशी दिवस' के रूप में मनाया जाता है। आज जिस स्थान पर वे शहीद हुए थे, वहां स्वदेशी मार्केट स्थित है और मुंबई व पुणे की कई सड़कों और मैदानों का नाम उनके सम्मान में रखा गया है। बाबू गेनू की कहानी हमें सिखाती है कि स्वदेशी केवल वस्तुओं का उपयोग नहीं, बल्कि राष्ट्र के आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता का प्रतीक है।