छत्रपति संभाजीनगर की ऐतिहासिक हिमरू फैक्ट्री का NHRC टीम ने किया दौरा, कारीगरों की सराहना
Handloom Industry Maharashtra: संभाजीनगर की ऐतिहासिक हिमरू फैक्ट्री का राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की टीम ने दौरा किया। पारंपरिक बुनाई कला की सराहना करते हुए संरक्षण और कारीगरों को सहयोग का भरोसा दिया।
- Written By: अंकिता पटेल
Sambhajinagar Traditional Textile Craft( Source: Social Media )
Sambhajinagar Traditional Textile Craft: छत्रपति संभाजीनगर शहर के नवाबपुरा स्थित 14वीं सदी की ऐतिहासिक हिमरू फैक्ट्री का राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की टीम ने दौरा किया। इतिहास के अनुसार, तुगलक काल में राजधानी का दौलताबाद स्थानांतरण के दौरान हिमरू बुनकरों को दिल्ली से यहां लाया गया था।
उसी परंपरा को उनके वंशज आज भी जीवित रखे हुए हैं। यह रेशम व सूती धागों (जरी) की बेहतरीन कारीगरी का एक केंद्र है, जहां हाथ से बुने हुए शॉल, शालू कपड़े व परिधान तैयार किए जाते हैं।
इस दौरान आयोग के चेयरमैन व विशेष फैक्ट्री प्रतिनिधि मोहम्मद जमशेद ने पारंपरिक हैंडलूम बुनाई की प्रक्रिया को करीब से देखा व कारीगरों की मेहनत की सराहना की। उन्होंने कहा कि सदियों पुरानी यह दुर्लभ कला आज भी अपने मूल स्वरूप में जीवित है व शहर की सांस्कृतिक विरासत का अहम हिस्सा है।
सम्बंधित ख़बरें
अभिनेत्री उषा चव्हाण के जमीन विवाद में उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की बड़ी एंट्री, TDR ट्रांजैक्शन पर लगाई रोक
नवी मुंबई में गुलाबी बहार! नेरुल के वेटलैंड्स पर उतरा हजारों फ्लेमिंगो का झुंड; देखें प्रकृति का यह नजारा
लाडकी बहीन योजना में अपात्र घोषित 70 लाख महिलाओं को मिला आखिरी मौका; दोबारा जमा कर सकेंगी दस्तावेज
संगठन सृजन अभियान के तहत कांग्रेस का बड़ा कदम, मुंबई में 7 हजार पदाधिकारी सीखेंगे राजनीति के गुर
साथ ही उन्होंने इसके संरक्षण व कारीगरों को प्रोत्साहन देने के लिए सरकारी स्तर पर हरसंभव सहयोग दिलाने का भरोसा भी दिलाया। फैक्ट्री प्रबंधन के अनुसार, हिमरू कला महिलाओं के आत्मनिर्भर बनने का सशक्त माध्यम बन रही है।
सरकारी स्तर पर ठोस प्रयासों की आवश्यकता
इसके लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम भी शुरू किया गया है, जिसमें अब तक 25 महिलाओं ने पंजीकरण कराया है व 13 महिलाएं इस कला में कुशल हो चुकी हैं।
यह भी पढ़ें:-मनपा की नई योजना, संभाजीनगर में 236 करोड़ कर वसूली, अब हर जोन में बनेंगे सहायता केंद्र
फैक्ट्री प्रबंधन का कहना है कि सरकार की ओर से कुछ योजनाओं के तहत सहायता मिलती है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। कारीगरों को बेहतर सुविधाएं व बाजार उपलब्ध कराने की जरूरत है, ताकि इस पारंपरिक कला को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सके। हिमरू कला को बचाने व आगे बढ़ाने के लिए सरकारी स्तर पर ठोस प्रयासों की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
