Sambhajinagar Fund Irregularities( Source: Social Media )
Chhatrapati Sambhajinagar Fund Irregularities: छत्रपति संभाजीनगर वर्ष 2025-26 में 737 करोड़ रुपये के जिला योजना निधि के वितरण में कथित अनियमितता और नियमों के उल्लंघन का मामला सामने आया है।
आरोप है कि पालक मंत्री ने निधर्धारित प्रक्रिया को दरकिनार करते हुए सीधे अपने लेटर पैड से विकास कार्यों को मंजूरी दे दी। इस गंभीर मामले में दाखिल रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए मुंबई उच्च न्यायालय की औरंगाबाद खंडपीठ ने प्रशासन को नोटिस जारी किया है।
मामले की अगली सुनवाई 18 अप्रैल को होगी। खंडपीठ के न्यायमूर्ति विभा कंकणवाडी और न्यायमूर्ति हितेन वेनेगांवकर ने इस प्रकरण को गंभीरता से लेते हुए राज्य सरकार, जिलाधिकारी छत्रपति संभाजीनगर, जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी और महानगर पालिका आयुक्त सहित संबंधित अधिकारियों को जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।
सांसद डॉ. कल्याण काले द्वारा दाखिल रिट याचिका में आरोप लगाया गया है कि जिला योजना निधि का वितरण महाराष्ट्र जिला नियोजन समिति अधिनियम, 1998 और संविधान के अनुच्छेद 243 (जेड-डी) के प्रावधानों के विपरीत किया गया।
याचिका में कहा गया है कि निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार प्रस्तावों पर समिति में चर्चा किए बिना सीधे मंजूरी दी गई। याचिका के अनुसार, पालक मंत्री ने आधिकारिक प्रणाली को नजरअंदाज करते हुए सीधे जिलाधिकारी को अपने लेटर पैड से कार्यों की सूची भेजकर मंजूरी प्रदान की। इससे जिला नियोजन समिति की भूमिका कमजोर हो गई और पूरी प्रक्रिया पारदर्शिता से दूर हो गई।
ग्राम पंचायत, नगर पंचायत, जिला परिषद, महानगरपालिका और अन्य विभागों से प्राप्त प्रस्तावों को नजरअंदाज कर सीधे कार्यों को मंजूरी देने का आरोप भी लगाया गया है। नियमानुसार सभी प्रस्तावों पर समिति में विस्तृत चर्चा जरूरी होती है।
लेकिन इस प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया याचिका में यह भी कहा गया है कि निधि वितरण के दौरान कार्यों को कृत्रिम रूप से छोटे-छोटे हिस्सों में बांटा गया, जिससे गुणवत्ता पर असर पड़ सकता है।
सार्वजनिक निर्माण विभाग के क्षेत्रीय मुख्य अभियंता ने इस तरह के विभाजन से बचने की सलाह दी थी, लेकिन उसे भी अनदेखा किया गया। याचिकाकर्ता ने ‘चरण वाघमारे बनाम महाराष्ट्र शासन’ मामले के निर्णय का हवाला देते हुए जिला नियोजन समिति की भूमिका और प्रक्रिया को स्पष्ट किया।
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खंडपीठ ने सभी संबंधित पक्षों को अगली सुनवाई से पहले शपथ पत्र दाखिल करने का आदेश दिया है। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता प्रसाद जरारे ने पक्ष रखा, जबकि शासन की और से वकील ए. बी. गिरासे ने प्रतिवाद प्रस्तुत किया इस मामले ने प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए है।