COVID मुआवजे पर बॉम्बे हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, RTPCR नेगेटिव होने पर भी मिलेंगे 50 लाख रुपए
Bombay High Court की औरंगाबाद पीठ ने कहा कि कोविड पीड़ित की मौत के बाद मुआवजा दावा केवल आरटीपीसीआर नेगेटिव रिपोर्ट के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता। अन्य मेडिकल सबूतों को भी मान्य माना जाएगा।
- Written By: आकाश मसने
बॉम्बे हाई कोर्ट की औरंगाबाद पीठ (सोर्स: सोशल मीडिया)
Covid Compensation Case: बॉम्बे हाई कोर्ट की औरंगाबाद पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि तकनीकी कारणों से कोविड-19 योद्धाओं के परिवारों का हक नहीं छीना जा सकता। अदालत ने कलेक्टर को निर्देश दिया कि 50 लाख रुपये के मुआवजे की प्रक्रिया शुरू की जाए, भले ही मुख्य आरटीपीसीआर रिपोर्ट में संक्रमण की पुष्टि न हुई हो।
बॉम्बे हाई कोर्ट की औरंगाबाद पीठ ने न्याय और संवेदनशीलता का परिचय देते हुए एक ऐतिहासिक आदेश पारित किया है। न्यायमूर्ति अरुण पेडनेकर और न्यायमूर्ति वैशाली जाधव की खंडपीठ ने नौ जनवरी को पारित अपने आदेश में स्पष्ट किया कि कोविड-19 पीड़ित व्यक्ति की मौत के बाद दायर मुआवजे की अर्जी केवल इस आधार पर खारिज नहीं की जा सकती कि आरटीपीसीआर (RTPCR) जांच रिपोर्ट में संक्रमण की पुष्टि नहीं हुई थी।
अहिल्यानगर कलेक्टर को दिया ये निर्देश
अदालत ने अहिल्यानगर के जिला कलेक्टर को कड़ा निर्देश दिया कि वे प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के तहत 50 लाख रुपये की बीमा राशि पाने से जुड़े एक व्यक्ति के दावे पर तुरंत प्रक्रिया शुरू करें। अदालत ने माना कि प्रशासन का केवल एक रिपोर्ट के आधार पर दावा खारिज करने का फैसला पूरी तरह से ‘अस्वीकार्य’ है।
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क्या था मचिंद्र गायकवाड़ का मामला?
यह पूरा कानूनी विवाद मचिंद्र गायकवाड़ नामक व्यक्ति की याचिका से जुड़ा है। गायकवाड़ की पत्नी एक स्वास्थ्य कर्मी थीं, जिन्होंने महामारी के कठिन दौर में अग्रिम पंक्ति में रहकर सेवा की थी। ड्यूटी के दौरान वह संक्रमित हुईं और उनकी मृत्यु हो गई। जब उनके पति ने सरकार की योजना के तहत मुआवजे की मांग की, तो कलेक्टर ने इसे इस आधार पर खारिज कर दिया कि मृतक की आरटीपीसीआर रिपोर्ट नेगेटिव थी।
बॉम्बे हाई कोर्ट की औरंगाबाद पीठ ने अहिल्यानगर कलेक्टर के इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि केवल इस कारण याचिकाकर्ता का मुआवजा दावा नहीं रोका जा सकता कि वह वह विशेष रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं कर सका।
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सीटी स्कैन और ऑक्सीजन स्तर को माना वैध साक्ष्य
सुनवाई के दौरान अदालत ने साक्ष्यों का सूक्ष्मता से अवलोकन किया। पीठ ने अपने आदेश में कहा कि हालांकि आरटीपीसीआर रिपोर्ट में मृतक की रिपोर्ट नेगेटिव थी, लेकिन अन्य मेडिकल रिपोर्ट में संक्रमण की स्पष्ट पुष्टि हुई थी। अदालत ने रेखांकित किया कि:
- मरीज का सीटी स्कैन (CT Scan) संक्रमण की गंभीरता दिखा रहा था।
- मरीज का ऑक्सीजन स्तर (Oxygen Level) लगातार गिर रहा था।
- मृत्यु प्रमाणपत्र सहित अन्य चिकित्सा दस्तावेजों में स्पष्ट रूप से दर्ज था कि मृत्यु महामारी (कोविड-19) के कारण हुई है।
अदालत ने प्रशासन को आदेश दिया कि वह यह स्वीकार करे कि महिला मौत के समय कोविड-19 से पीड़ित थी और इस दावे को संबंधित बीमा प्राधिकरण को भेजे।
कोरोना योद्धाओं के लिए बड़ी राहत
यह फैसला उन हजारों कोरोना योद्धाओं, चिकित्सकों और स्वास्थ्य कर्मियों के परिवारों के लिए एक नजीर बनेगा जिन्होंने महामारी के दौरान अपनी जान गंवाई। प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना विशेष रूप से इन्हीं योद्धाओं के परिवारों को आर्थिक सुरक्षा देने के लिए शुरू की गई थी। हाई कोर्ट का यह रुख सुनिश्चित करता है कि नौकरशाही की कागजी औपचारिकताएं किसी शहीद योद्धा के परिवार के वैध अधिकारों के आड़े न आएं।
