
CJI बीआर गवई (सौजन्य-सोशल मीडिया)
SC-ST Reservation Debate: भारत के प्रधान न्यायाधीश बीआर गवई ने रविवार को दोहराया कि वह अनुसूचित जातियों के आरक्षण में मलाईदार तबके (क्रीमी लेयर) को शामिल न करने के पक्ष में हैं। गवई ने कहा कि आरक्षण के मामले में एक आईएएस अधिकारी के बच्चों की तुलना एक गरीब खेतिहर मजदूर के बच्चों से नहीं की जा सकती।
उन्होंने कहा मैंने आगे बढ़कर यह विचार रखा कि मलाईदार तबके की अवधारणा, जैसा कि इंद्रा साहनी (बनाम भारत संघ एवं अन्य) के फैसले में पाया गया है, लागू होनी चाहिए, जो अन्य पिछड़ा वर्ग पर लागू होता है वही अनुसूचित जातियों पर भी लागू होना चाहिए।
हालांकि इस मुद्दे पर मेरे फैसले की व्यापक रूप से आलोचना हुई है। हालांकि मेरा अब भी मानना है कि न्यायाधीशों से सामान्यतः अपने फैसलों को सही ठहराने की अपेक्षा नहीं की जाती है और मेरी सेवानिवृत्ति में अभी लगभग एक सप्ताह बाकी है।
आरक्षण न्यायमूर्ति गवई ने 20024 में कहा था कि राज्यों को अनुसुचित जातियों (एससी) और अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के बीच भी क्रीमी लेवर की पहचान करने और उन्हें आरक्षण का लाभ देने से इनकार करने के लिए एक नीति विकसित करनी चाहिए। यह कहते हुए कि भारतीय संविधान जड़ नहीं है, न्यायमूर्ति गवई ने कहा कि डॉ. बीआर आंबेडकर कर हमेशा से मानना था कि इसे संशोधन की गुंजाइश वाला और एक अत्याधुनिक जीवंत दस्तावेज होना चाहिए क्योंकि अनुच्छेद 368 संविधान में संशोधन का प्रावधान करता है।
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प्रधान न्यायाधीश ने इस बात पर जोर दिया कि संविधान सभा में संविधान के मसौदे की प्रस्तुति के दौरान डॉ. आंबेडकर के भाषण सबसे महत्वपूर्ण भाषण है जिसे कानून के प्रत्येक छात्र को पढ़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि संविधान के कारण ही भारत में अनुसूचित जाति से दो राष्ट्रपति हुए और वर्तमान राष्ट्रपति भी अनुसूचित जनजाति की एक महिला है। महिला सशक्तिकरण भी बढ़ा है।






