अमरावती में खेत मजदूरों का कलेक्ट्रेट पर महाधरना, मनरेगा बहाल करने की मांग
Amravati Labours Protest: अमरावती कलेक्ट्रेट पर लाल बावटा खेत मजदूर यूनियन ने महाधरना देकर 'व्हीबी जिग्रामजी' कानून को रद्द करने और मनरेगा के तहत 200 दिन काम व 700 रुपये दिहाड़ी देने की मांग की है।
- Written By: केतकी मोडक
खेत मजदूरों जिलाधिकारी कार्यालय पर आंदोलन करते हुए (सोर्स - फोटो नवभारत)
Amravati Lal Bawta Khet Mazdoor Protest: महाराष्ट्र राज्य लाल बावटा खेत मजदूर यूनियन अमरावती जिला काउंसिल के बैनर तले मंगलवार को खेत मजदूरों की विभिन्न ज्वलंत मांगों को लेकर जिलाधिकारी कार्यालय पर एक दिवसीय महाधरना आंदोलन किया गया। यह आंदोलन देशव्यापी आंदोलन के हिस्से के रूप में सुबह 11 बजे से शाम 4 बजे तक था।
प्रशासन को सौंपा गया ज्ञापन
इससे पूर्व यूनियन द्वारा मनरेगा बचाओ जनजागरण अभियान चलाया। खेत मजदूरों की समस्याओं के समाधान के लिए कलेक्ट्रेट को ज्ञापन सौंपा गया।
ज्ञापन में ‘व्हीबी जिग्रामजी’ कानून को रद्द कर मनरेगा कानून को पहले की तरह लागू रखने, इसके तहत साल में 200 दिन का काम और 700 दैनिक न्यूनतम मजदूरी देने, सभी भूमिहीनों को जीविका के लिए 5 एकड़ सरकारी जमीन देने, दादासाहेब गायकवाड सबलीकरण योजना के तहत निजी जमीनों का अधिग्रहण कर और सरकारी भूमि भूमिहीनों को आवंटित करने, प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत घर बनाने के लिए मिलने वाली राशि बहुत कम है, इसे बढ़ाकर कम से कम 5 लाख करने सहित अन्य मांगे की गई।
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धरना प्रदर्शन में जिला सचिव संजय मंडवधरे, अमरावती जिला अध्यक्ष चंद्रकांत वडस्कर, कार्याध्यक्ष सुनील घटाले, नारायणराव भगवे, ज्ञानेश्वर मेश्राम, माला वानखड़े, प्रज्ञा बनसोड, जयेंद्र भोगे, लक्ष्मण भगेवार, इसराइल शाह, बापूराव बालापुरे, किशोर काले, बाबाराव इंगले, वैशाली निस्वादे, सुरेश शंभरकर, करुणा धवणे उपस्थित थे।
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मजदूरी बेहद कम
- आंदोलनकारियों का कहना है कि कृषि के मशीनीकरण के कारण खेत मजदूर बड़े पैमाने पर विस्थापित हो रहे हैं और सरकार उन्हें उनके हाल पर छोड़ रही है।
- खेतों में काम कम हो गया है और मजदूरी बेहद कम है। बढ़ती महंगाई के कारण अन्न, वस्त्र, मकान, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी जरूरतें पूरी करना भी मुश्किल हो गया है।
- एक तरफ देश में अमीरी बढ़ रही है, तो दूसरी तरफ गरीब और गरीब होता जा रहा है। सरकार भले ही देश को महासत्ता बनाने का दावा करे, लेकिन हकीकत में गांवों और खेत मजदूरों को आदिम अवस्था में धकेला जा रहा है।
