Akola News: धोबी समाज के अनुसूचित जाति प्रवर्ग में समावेश के प्रश्न पर सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल याचिका के माध्यम से न्यायिक मार्ग से समाधान की दिशा में कदम उठाए जाने पर समाज में आनंद व्यक्त किया गया. इस संदर्भ में आयोजित सहविचार सभा में धोबी समाज पुनर्विलोकन समिति के तत्कालीन अध्यक्ष एवं पूर्व कैबिनेट मंत्री डॉ. दशरथ भांडे ने मार्गदर्शन किया. उन्होंने कहा कि पिछले 40 वर्षों से समाज लगातार अनुसूचित जाति प्रवर्ग में समावेश की मांग कर रहा है.
अब समाज ने सामूहिक रूप से सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है, यह अत्यंत दिलासादायक और आशाजनक कदम है. महाराष्ट्र में भी मिले सहुलियत अकोला के शासकीय विश्रामगृह में आयोजित इस बैठक में मुख्य याचिकाकर्ता विवेक ठाकरे पुणे, सहयाचिकाकर्ता सुभाष टाले मुर्तिजापुर, उमेश जानोरकर अमरावती और प्रा. के.आर. राऊत उपस्थित थे. डॉ. भांडे ने बताया कि भारत के 13 राज्यों और 5 केंद्रशासित प्रदेशों में धोबी समाज अनुसूचित जाति प्रवर्ग में शामिल है.
महाराष्ट्र में भी समाज को एससी सहूलतें मिल रही थीं, लेकिन 1960 में राज्य की स्वतंत्र निर्मिती के बाद धोबी समाज को गलती से पिछड़ा प्रवर्ग में शामिल कर दिया गया. इस अन्याय को दूर करने के लिए अब सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दाखिल की गई है. उन्होंने स्मरण कराया कि तत्कालीन मुख्यमंत्री दिवंगत विलासराव देशमुख ने उनके अध्यक्षता में पांच सदस्यीय पुनर्विलोकन समिति गठित की थी. सरकार से की 3 सिफारिशें समिति ने 2002 में शासन को तीन स्पष्ट सिफारिशें प्रस्तुत की थीं.
धोबी समाज को अनुसूचित जाति प्रवर्ग में समाविष्ट किया जाए. जब तक सहूलतें लागू नहीं होतीं, तब तक समाज को संबंधित योजनाओं का लाभ दिया जाए. समाज के पुनर्विकास हेतु आर्थिक विकास महामंडल की स्थापना कर स्वतंत्र निधि उपलब्ध कराया जाए. इसके बाद बार्टी संस्था ने भी समाज के पक्ष में पूरक रिपोर्ट प्रस्तुत किया था. बावजूद इसके राज्य और केंद्र के सामाजिक न्याय विभाग ने इन रिपोर्ट की उपेक्षा की. अब दाखिल याचिका में सभी प्रकार से सहयोग करने का आश्वासन डॉ. भांडे ने दिया.