Mahayuti internal rif (सोर्सः सोशल मीडिया)
Sangamner Mahayuti Conflict: अनुमान लगाया जा रहा है कि तालुका में महायुति के घटक दलों के पदाधिकारियों के बीच चल रहे अंदरूनी मतभेदों का असर आगामी जिला परिषद और पंचायत समिति चुनावों पर पड़ सकता है। इस चुनाव में गार्डियन मिनिस्टर राधाकृष्ण विखे पाटिल की भूमिका बेहद अहम मानी जा रही है। यदि उन्होंने समय रहते ध्यान नहीं दिया, तो समर्थकों के बीच यह चर्चा तेज है कि क्या संगमनेर नगरपालिका चुनाव का परिणाम जिला परिषद और पंचायत समिति चुनावों में भी दोहराया जाएगा।
संगमनेर तालुका में महायुति की कमान विधायक अमोल खटाल संभाल रहे हैं। पिछले कुछ दिनों से शिवसेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और भारतीय जनता पार्टी जैसे घटक दलों के कार्यकर्ताओं में नाराजगी का माहौल देखा जा रहा है। नगरपालिका चुनाव में महायुति को महापौर और पार्षद पद सहित लगभग सभी सीटों पर हार का सामना करना पड़ा। पूर्व मंत्री बालासाहेब थोराट का संगमनेर तालुका में करीब 40 वर्षों तक दबदबा रहा है। हालांकि उस दौर में भी नगरपालिका चुनावों में शिवसेना-भाजपा के कई पार्षद चुने जाते रहे थे। वर्तमान में तालुका में अनुकूल स्थिति होने के बावजूद महायुति का नगर पालिका में केवल एक सीट जीत पाना विश्लेषण का विषय बन गया है।
अब जिला परिषद और पंचायत समिति चुनाव निकट हैं। जहां गठबंधन पूर्व मंत्री बालासाहेब थोरात के नेतृत्व में जोरदार तैयारी में जुटा है, वहीं महायुति के पदाधिकारी अपेक्षित गंभीरता दिखाते नजर नहीं आ रहे हैं। नगरपालिका चुनाव में अमोल खटाल के एक पुराने समर्थक ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा, जबकि भाजपा के वरिष्ठ पदाधिकारी इससे दूरी बनाए रहे। इसका सीधा नुकसान महायुति को उठाना पड़ा।
तालुका में महायुति पदाधिकारियों के बीच आंतरिक मतभेदों के चलते कई नेताओं ने अमोल खटाल से दूरी बना ली है। शहर के कई व्यापारियों ने भी महायुति से किनारा कर लिया था। नगरपालिका चुनाव में इन व्यापारियों ने पूर्व मंत्री थोरात और सत्यजीत तांबे के नेतृत्व वाली संगमनेर सेवा समिति का खुलकर समर्थन किया था।
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भाजपा के एक वरिष्ठ पदाधिकारी पिछले कुछ महीनों से सक्रिय राजनीति से दूर दिखाई दे रहे हैं। पदाधिकारियों की तरह कई प्रमुख कार्यकर्ता भी निष्क्रिय हो गए हैं। अमोल खटाल के प्रति समर्थन बनाए रखने के लिए कुछ कार्यकर्ता केवल कार्यालय तक सीमित नजर आते हैं और मैदान में सक्रिय नहीं दिखते। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ता भी खटाल के संपर्क कार्यालय में कम ही दिखाई दे रहे हैं।
गार्डियन मिनिस्टर राधाकृष्ण विखे पाटिल और पूर्व सांसद डॉ. सुजय विखे पाटिल ने भी नगरपालिका चुनावों पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया। अब कई पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि आगामी जिला परिषद और पंचायत समिति चुनावों में उनकी भूमिका क्या रहने वाली है।